Saturday, January 22, 2022

जब हिटलर भी हो गया नेताजी का कायल.!

आजादी दिलाने के प्रयासों के क्रम में नेताजी सुभाष चंद्र बोस एक बार हिटलर से मिलने गए. उस वक्त का एक रोचक किस्सा है...! दरअसल जब वह हिटलर से मिलने गए तो उन्हें एक कमरे में बिठा दिया गया.! उस दौरान दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था और हिटलर की जान को खतरा था, अपने बचाव के लिए हिटलर अपने आस-पास बॉडी डबल रखता था जो बिल्कुल उसी के जैसे लगाता था.! 


थोड़ी देर बाद नेता जी से मिलने के लिए हिटलर की शक्ल का एक शख्स आया और नेताजी की तरफ हाथ बढ़ाया. नेताजी ने हाथ तो मिला लिया लेकिन मुस्कुराकर बोले आप हिटलर नहीं हैं मैं उनसे मिलने आया हूं।। वह शख्स सकपका गया और वापस चला गया,थोड़ी देर बाद हिटलर जैसा दिखने वाला एक और शख्स नेता जी से मिलने आया..! हाथ मिलाने के बाद नेताजी ने उससे भी यही कहा कि वे हिटलर से मिलने आए हैं ना कि उनके बॉडी डबल से...! 


इसके बाद हिटलर खुद आया, इस बार नेताजी ने असली हिटलर को पहचान लिया और कहा, '' मैं सुभाष हूं... भारत से आया हूं.. आप हाथ मिलाने से पहले कृपया दस्ताने उतार दें क्योंकि मैं मित्रता के बीच में कोई दीवार नहीं चाहता.'' नेताजी के आत्मविश्वास को देखकर हिटलर भी उनका कायल हो गया...! उसने तुरंत नेताजी से पूछा आपने मेरे हमशक्लों को कैसे पहचान लिया. नेताजी ने उत्तर दिया- 'उन दोनों ने अभिवादन के लिए पहले हाथ बढ़ाया जबकि ऐसा मेहमान करते हैं.' नेताजी की बुद्धिमत्ता से हिटलर प्रभावित हो गया..! फिर हिटलर ने बोस जी से बहुत देर तक बातें की क्योंकि हिटलर ज्यादा किसी से मिलता नहीं था और ना ही बात करता था लेकिन नेताजी की विशाल शख्सियत के आगे भी हिटलर को झुकना पड़ा..!

Monday, January 17, 2022

मैं बनारस हूं.!

मैं बनारस हूँ....


मन कहता है मन करता है

कुछ बनारस के नाम लिखूँ!

इसे विद्या का मंदिर कह दूँ

या इसको तीरथ धाम लिखूँ.!!


पानी में गंगाजल हूँ

और पत्थर में मैं पारस हूँ!

इस पावन धरती पर मैं

पावन शहर बनारस हूँ!!


मैं गूगल की अडवाइस नहीं 

बुजुर्गों की अनुभवी राय हूँ!!

मैं नहीं हॉट कॉफी लाते सी

मैं कुल्लहड वाली चाय हूँ.!!


मैं वैलेंटाइन का सेलिब्रेशन नहीं

करवा चौथ मनाने वाली हूँ!

मैं रोज बुके नहीं रोज डे का

मैं पूजा के फूलों की थाली हूँ!!


विद्या धन पाने वालों के लिए

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय हूँ!

भक्ति में श्रद्धा रखने के लिए

मैं दुर्गाकुंड और शिवालय हूँ!!


संकट को हरने वाला 

संकट मोचन का हनुमान हूँ मैं!

मर्यादा की राह बताने को

तुलसी मानस का राम हूँ मैं.!!


मैं शिव पार्वतीजी  की धरती 

मैं ही हूँ काशी विश्वनाथ 

मै विंध्याचल का आँचल हूँ

मैं बुद्ध जैनों की सारनाथ


मैं मालवीय जी की शक्ति

मुंशी प्रेमचंद की कहानी हूँ!

मैं दोहा तुलसी दास की हूँ

मैं ही कबीर की वाणी हूँ!!


मैं हरीश चंद्र की सच्चाई

मानवता की गहराई हूँ!

मैं नहीं पॉप डिस्को म्यूज़िक

बिस्मिल्लाह की शहनाई हूँ!!


मैं दशाश्वमेध की आरती हूँ

मैं ही शामें अस्सी हूँ!

मैं कोई पेप्सी कोला नहीं

मैं रामनगर की लस्सी हूँ!!


मैं सुबह की राग भैरवी हूँ

और कल्याण थाट हूँ मैं!

मैं मोक्ष मुक्ति का द्वार भी हूँ

हाँ मणिकर्णिका घाट हूँ मैं .!!


Wednesday, January 12, 2022

स्वार्थ की राजनीति.!

 

स्वार्थ की राजनीति.!

आज के समय में सभी राजनीतिक पार्टियां दूसरे दल से आए हुए उन तमाम नेताओं को तुरंत तरहीज देती है,उसे टिकट देकर चुनाव भी लड़वाती है उसके बाद इन नेताओं को चुनाव जीतने के बाद सत्ता सुख भोगने के भरपूर मौका देती उन्हें मंत्री भी बना देती हैं। जबकि इनके ख़ुद के कार्यकर्ता पार्टी के लिए जीजान से युवा से लेकर बुढ़ापे तक मेहनत करते हुए पता चलता है कि एक दिन स्वर्गलोक को चले जाते हैं उन्हें किसी भी तरह का कोई भी मौका नहीं मिल पाता है।
जबकि दूसरे दलों से आए हुए ये स्वार्थी नेता लोग 5 साल सत्ता का भरपूर आनंद लेते हैं और फिर जब चुनाव आता है तो पुनः दूसरे दल के दरवाजे पर भिखारी की तरह हाथ फ़ैलाते हुए चले जाते विडंबना देखिए कि वहां हर्ष के साथ अपना भी लिया जाता है। ख़ैर जाए भी क्यों न उसे वहां उसको लाभ दिखाई देता है लेकिन जब वो जिस पार्टी में जाते हैं और वो पार्टी सत्ता में दुबारा नहीं आती है तो बेचारे कहीं के नहीं होते हैं।😀😁
दरबदर भटकते रहते हैं, और फिर CBI, ED, income Tax के छापेमारी में ही इनकी जिंदगी बीत जाती है और फिर किसी को हार्ट अटैक तो किसी को कैंसर और धीरे धीरे ये नेता लोग विलुप्त होने लगते हैं..!😃😀

Monday, January 10, 2022

हमारे अंदर का धीरज.!

 कभी कोयला पर पका, खाया और फिर फेंका हुआ भुट्टा जो हमारे यहाँ लेढ़ा होता है उसे देखा है आपने?निश्चित देखा होगा क्योंकि यह सहज ही कहीं भी रोड के किनारे, घर के टीन या छत पर बहिष्कृत मिल जाता है। हमारे शिष्ट समाज में फेंका हुआ भुट्टा अलावन के अलावे और किसी काम का नहीं होता।प्रकृति भी इस भुट्टे को अपनी यातना की अनंत प्रक्रियाओं के द्वारा प्रताड़ना के चरम बिंदु तक पहुँचा देती है किंतु भुट्टा यातनाओं से डिगता कहाँ है।ये यातनाएं उसके लिए उत्प्रेरक होती है और फिर वर्षा आती है और आते-आते उस भुट्टे में सिंदूरी परत तैयार कर देती है और यह सिंदूरी नए जीवन का द्योतक होता है।

       वह जीवन जो विपरीत परिस्थितियों में आकार लेता है।नवजीवन के इस उत्पत्ति को पत्थर पर डूब उग आने की संज्ञा देना अतिशयोक्ति नहीं होगा और यही चरित्र देखकर अंदर का धीरज बेबाक होकर बोल उठता है........

     जिंदगी तो "भरी"ही होती है न....

    और जिंदगी कभी-कभी खालीपन में ऐसे भी पनप ही जाती है..तब क्यों परिस्थितियों के थपेड़ो को सर पर लेकर घूमना है..! यह खूबसूरत जीवन है भाई और उससे ज्यादा कही खूबसूरत हमारे अंदर का धीरज

Sunday, January 9, 2022

एक सफ़र था जिसमें कोई हमसफ़र था..!

 


ट्रेन चलने को ही थी कि अचानक कोई जाना पहचाना सा चेहरा जनरल में आ गया। मैं अकेली सफर पर थी। सब अजनबी चेहरे थे। स्लीपर का टिकट नहीं मिला तो जनरल डिब्बे में ही बैठना पड़ा। मगर यहां ऐसे हालात में उस शख्स से मिलना। जिंदगी के लिए एक संजीवनी के समान था।

जिंदगी भी कमबख्त कभी कभी अजीब से मोड़ पर ले आती है। ऐसे हालातों से सामना करवा देती है जिसकी कल्पना तो क्या कभी ख्याल भी नही कर सकते.!

वो आया और मेरे पास ही खाली जगह पर बैठ गया। ना मेरी तरफ देखा। ना पहचानने की कोशिश की। कुछ इंच की दूरी बना कर चुप चाप पास आकर बैठ गया। बाहर सावन की रिमझिम लगी थी। इस कारण वो कुछ भीग गया था। मैने कनखियों से नजर बचा कर उसे देखा। उम्र के इस मोड़ पर भी कमबख्त वैसा का वैसा ही था। हां कुछ भारी हो गया था। मगर इतना ज्यादा भी नही।
फिर उसने जेब से चश्मा निकाला और मोबाइल में लग गया।

चश्मा देख कर मुझे कुछ आश्चर्य हुआ। उम्र का यही एक निशान उस पर नजर आया था कि आंखों पर चश्मा चढ़ गया था। चेहरे पर और सर पे मैने सफेद बाल खोजने की कोशिश की मग़र मुझे नही दिखे।

मैंने जल्दी से सर पर साड़ी का पल्लू डाल लिया। बालो को डाई किए काफी दिन हो गए थे मुझे। ज्यादा तो नही थे सफेद बाल मेरे सर पे। मगर इतने जरूर थे कि गौर से देखो तो नजर आ जाए।

मैं उठकर बाथरूम गई। हैंड बैग से फेसवाश निकाला चेहरे को ढंग से धोया फिर शीशे में चेहरे को गौर से देखा। पसंद तो नही आया मगर अजीब सा मुँह बना कर मैने शीशा वापस बैग में डाला और वापस अपनी जगह पर आ गई।

मग़र वो साहब तो खिड़की की तरफ से मेरा बैग सरकाकर खुद खिड़की के पास बैठ गए थे।
मुझे पूरी तरह देखा भी नही बस बिना देखे ही कहा, " सॉरी, भाग कर चढ़ा तो पसीना आ गया था । थोड़ा सुख जाए फिर अपनी जगह बैठ जाऊंगा।" फिर वह अपने मोबाइल में लग गया। मेरी इच्छा जानने की कोशिश भी नही की। उसकी यही बात हमेशा मुझे बुरी लगती थी। फिर भी ना जाने उसमे ऐसा क्या था कि आज तक मैंने उसे नही भुलाया। एक वो था कि दस सालों में ही भूल गया। मैंने सोचा शायद अभी तक गौर नही किया। पहचान लेगा। थोड़ी मोटी हो गई हूँ। शायद इसलिए नही पहचाना। मैं उदास हो गई।

जिस शख्स को जीवन मे कभी भुला ही नही पाई उसको मेरा चेहरा ही याद नही😔

माना कि ये औरतों और लड़कियों को ताड़ने की इसकी आदत नही मग़र पहचाने भी नही😔

शादीशुदा है। मैं भी शादीशुदा हुँ जानती थी इसके साथ रहना मुश्किल है मग़र इसका मतलब यह तो नही कि अपने खयालो को अपने सपनो को जीना छोड़ दूं।
एक तमन्ना थी कि कुछ पल खुल के उसके साथ गुजारूं। माहौल दोस्ताना ही हो मग़र हो तो सही😔

आज वही शख्स पास बैठा था जिसे स्कूल टाइम से मैने दिल मे बसा रखा था। सोसल मीडिया पर उसके सारे एकाउंट चोरी छुपे देखा करती थी। उसकी हर कविता, हर शायरी में खुद को खोजा करती थी। वह तो आज पहचान ही नही रहा😔

माना कि हम लोगों में कभी प्यार की पींगे नही चली। ना कभी इजहार हुआ। हां वो हमेशा मेरी केयर करता था, और मैं उसकी केयर करती थी। कॉलेज छुटा तो मेरी शादी हो गई और वो फ़ौज में चला गया। फिर उसकी शादी हुई। जब भी गांव गई उसकी सारी खबर ले आती थी।

बस ऐसे ही जिंदगी गुजर गई।

आधे घण्टे से ऊपर हो गया। वो आराम से खिड़की के पास बैठा मोबाइल में लगा था। देखना तो दूर चेहरा भी ऊपर नहीं किया..!😔

मैं कभी मोबाइल में देखती कभी उसकी तरफ। सोशल मीडिया पर उसके एकाउंट खोल कर देखे। तस्वीर मिलाई। वही था। पक्का वही। कोई शक नही था। वैसे भी हम महिलाएं पहचानने में कभी भी धोखा नही खा सकती। 20 साल बाद भी सिर्फ आंखों से पहचान ले☺️
फिर और कुछ वक्त गुजरा। माहौल वैसा का वैसा था। मैं बस पहलू बदलती रही।

फिर अचानक टीटी आ गया। सबसे टिकिट पूछ रहा था।
मैंने अपना टिकिट दिखा दिया। उससे पूछा तो उसने कहा नही है।

टीटी बोला, "फाइन लगेगा"
वह बोला, "लगा दो"
टीटी, " कहाँ का टिकिट बनाऊं?"

उसने जल्दी से जवाब नही दिया। मेरी तरफ देखने लगा। मैं कुछ समझी नही।
उसने मेरे हाथ मे थमी टिकट को गौर से देखा फिर टीटी से बोला, " कानपुर।"
टीटी ने कानपुर की टिकट बना कर दी। और पैसे लेकर चला गया।
वह फिर से मोबाइल में तल्लीन हो गया।

आखिर मुझसे रहा नही गया। मैंने पूछ ही लिया,"कानपुर में कहाँ रहते हो?"
वह मोबाइल में नजरें गढ़ाए हुए ही बोला, " कहीँ नही"
वह चुप हो गया तो मैं फिर बोली, "किसी काम से जा रहे हो"
वह बोला, "हाँ"

अब मै चुप हो गई। वह अजनबी की तरह बात कर रहा था और अजनबी से कैसे पूछ लूँ किस काम से जा रहे हो।
कुछ देर चुप रहने के बाद फिर मैंने पूछ ही लिया, "वहां शायद आप नौकरी करते हो?"
उसने कहा,"नही"

मैंने फिर हिम्मत कर के पूछा "तो किसी से मिलने जा रहे हो?"
वही संक्षिप्त उत्तर ,"नही"
आखरी जवाब सुनकर मेरी हिम्मत नही हुई कि और भी कुछ पूछूँ। अजीब आदमी था । बिना काम सफर कर रहा था।
मैं मुँह फेर कर अपने मोबाइल में लग गई।
कुछ देर बाद खुद ही बोला, " ये भी पूछ लो क्यों जा रहा हूँ कानपुर?"

मेरे मुंह से जल्दी में निकला," बताओ, क्यों जा रहे हो?"
फिर अपने ही उतावलेपन पर मुझे शर्म सी आ गई।
उसने थोड़ा सा मुस्कराते हुवे कहा, " एक पुरानी दोस्त मिल गई। जो आज अकेले सफर पर जा रही थी। फौजी आदमी हूँ। सुरक्षा करना मेरा कर्तव्य है । अकेले कैसे जाने देता। इसलिए उसे कानपुर तक छोड़ने जा रहा हूँ। " इतना सुनकर मेरा दिल जोर से धड़का। नॉर्मल नही रह सकी मैं।

मग़र मन के भावों को दबाने का असफल प्रयत्न करते हुए मैने हिम्मत कर के फिर पूछा, " कहाँ है वो दोस्त?"
कमबख्त फिर मुस्कराता हुआ बोला," यहीं मेरे पास बैठी है ना"

इतना सुनकर मेरे सब कुछ समझ मे आ गया। कि क्यों उसने टिकिट नही लिया। क्योंकि उसे तो पता ही नही था मैं कहाँ जा रही हूं। सिर्फ और सिर्फ मेरे लिए वह दिल्ली से कानपुर का सफर कर रहा था। जान कर इतनी खुशी मिली कि आंखों में आंसू आ गए।

दिल के भीतर एक गोला सा बना और फट गया। परिणाम में आंखे तो भिगनी ही थी।
बोला, "रो क्यों रही हो?"

मै बस इतना ही कह पाई," तुम मर्द हो नही समझ सकते"
वह बोला, " क्योंकि थोड़ा बहुत लिख लेता हूँ इसलिए एक कवि और लेखक भी हूँ। सब समझ सकता हूँ।"
मैंने खुद को संभालते हुए कहा "शुक्रिया, मुझे पहचानने के लिए और मेरे लिए इतना टाइम निकालने के लिए"
वह बोला, "प्लेटफार्म पर अकेली घूम रही थी। कोई साथ नही दिखा तो आना पड़ा। कल ही रक्षा बंधन था। इसलिए बहुत भीड़ है। तुमको यूँ अकेले सफर नही करना चाहिए।"

"क्या करती, उनको छुट्टी नही मिल रही थी। और भाई यहां दिल्ली में आकर बस गए। राखी बांधने तो आना ही था।" मैंने मजबूरी बताई।

"ऐसे भाइयों को राखी बांधने आई हो जिनको ये भी फिक्र नही कि बहिन इतना लंबा सफर अकेले कैसे करेगी?"

"भाई शादी के बाद भाई रहे ही नही। भाभियों के हो गए। मम्मी पापा रहे नही।"

कह कर मैं उदास हो गई।
वह फिर बोला, "तो पति को तो समझना चाहिए।"
"उनकी बहुत बिजी लाइफ है मैं ज्यादा डिस्टर्ब नही करती। और आजकल इतना खतरा नही रहा। कर लेती हुँ मैं अकेले सफर। तुम अपनी सुनाओ कैसे हो?"

"अच्छा हूँ, कट रही है जिंदगी"
"मेरी याद आती थी क्या?" मैंने हिम्मत कर के पूछा।
वो चुप हो गया।

कुछ नही बोला तो मैं फिर बोली, "सॉरी, यूँ ही पूछ लिया। अब तो परिपक्व हो गए हैं। कर सकते है ऐसी बात।"
उसने शर्ट की बाजू की बटन खोल कर हाथ मे पहना वो तांबे का कड़ा दिखाया जो मैंने ही फ्रेंडशिप डे पर उसे दिया था। बोला, " याद तो नही आती पर कमबख्त ये तेरी याद दिला देता था।"

कड़ा देख कर दिल को बहुत शुकुन मिला। मैं बोली "कभी सम्पर्क क्यों नही किया?"

वह बोला," डिस्टर्ब नही करना चाहता था। तुम्हारी अपनी जिंदगी है और मेरी अपनी जिंदगी है।"
मैंने डरते डरते पूछा," तुम्हे छू लुँ"

वह बोला, " पाप नही लगेगा?"
मै बोली," नही छू ने से नही लगता।"
और फिर मैं कानपुर तक उसका हाथ पकड़ कर बैठी रही।।

बहुत सी बातें हुईं।

जिंदगी का एक ऐसा यादगार दिन था जिसे आखरी सांस तक नहीं भुला पाऊंगी।
वह मुझे सुरक्षित घर छोड़ कर गया। रुका नही। बाहर से ही चला गया।

जम्मू थी उसकी ड्यूटी....चला गया।

उसके बाद उससे कभी बात नही हुई। क्योंकि हम दोनों ने एक दूसरे के फोन नम्बर नहीं लिए।

हांलांकि हमारे बीच कभी भी नापाक कुछ भी नही हुआ। एक पवित्र सा रिश्ता था। मगर रिश्तो की गरिमा बनाए रखना जरूरी था।

फिर ठीक एक महीने बाद मैंने अखबार में पढ़ा कि वो देश के लिए शहीद हो गया। क्या गुजरी होगी मुझ पर वर्णन नही कर सकती। उसके परिवार पर क्या गुजरी होगी। पता नहीं.!😔

लोक लाज के डर से मैं उसके अंतिम दर्शन भी नहीं कर सकी।

आज उससे मिले एक साल हो गया है आज भी रक्षाबन्धन का दूसरा दिन है आज भी सफर कर रही हूँ। दिल्ली से कानपुर जा रही हूं। जानबूझकर जर्नल डिब्बे का टिकिट लिया है मैंने।
अकेली हूँ। न जाने दिल क्यों आस पाले बैठा है कि आज फिर आएगा और पसीना सुखाने के लिए उसी खिड़की के पास बैठेगा।
एक सफर वो था जिसमे कोई हमसफ़र था।
एक सफर आज है जिसमे उसकी यादें हमसफ़र है। बाकी जिंदगी का सफर जारी है देखते है कौन मिलता है कौन साथ छोड़ता है...!!

Omicron और Corona

दुनिया Omicron से Delmicron तक पहुंच रही है लेकिन भारत की सभी पार्टियां बीजेपी, सपा, बसपा और कांग्रेस उत्तर प्रदेश के चुनाव में वोट बैंक तक पहुंच रही है। सत्ता पक्ष अर्थात बीजेपी को तत्काल प्रभाव से चुनाव अभियान रोकते हुए Omicron ओर Delmicron से लड़ने की गहन और व्यापक रणनीति बनाते हुए  कार्य करना चाहिए था वहीं पर विपक्ष की सभी पार्टियों को अपने अपने पद ओर सत्ता के लालच को छोड़कर सरकार पर जान माल की हानि को बचाने के लिए कार्य करने हेतु दबाव डालना चाहिए था। परंतु राहुल, अखिलेश भी ऐसा नहीं कर रहे हैं क्योंकि बहती गंगा में हाथ कौन नहीं धोना चाहता ?? सभी विपक्षी पार्टियां सोच रही हैं कि सरकार जो कर रही है करने दीजिए इससे कोरोना वायरस महीने भर बाद जब चारों तरफ हाहाकार मचाएगा और जब चारो तरफ लाशें  दिखाई देगी तो हम सत्तापक्ष पर सारा ठीकरा फोड़कर स्वयं को पाक साफ साबित कर देंगे। अगर बात करें जनता की तो देश की बहुसंख्यक जनता तो लॉकडाउन से उत्पन्न प्रभावों से अपने घर और परिवार को बचाने में लगी हुई है और देश मे जो कुछ बचे हुए बुद्धिजीवी हैं उन्होंने जब परिस्थितियां बिगड़ जाएगी तब तक के लिए अपनी बुद्धि को गिरवी रखा हुआ है ताकि जब परिस्थितियां बिगड़ने लगे तब सोशल मीडिया और न्यूज़ चैनलों के माध्यम से बड़े-बड़े आर्टिकल लिखकर अपनी विक्षिप्त बुद्धिमता का परचम लहरा सके।

अंततः अगर आपमें तनिक भी विवेक और ज्ञान शेष रहा है तो कृपया कर सरकार पर दबाव बनाइए कि सभी कार्य छोड़ कर पहले आने वाले तूफान से देश को बचाइए क्योंकि जब लोग ही नहीं रहेंगे तो लोकतंत्र किस काम का.!

Friday, January 7, 2022

अमीरी पैसे से नहीं दिल से होती है.!

 दुनिया के सबसे धनवान व्यक्ति बिल गेट्स से किसी ने पूछा - 'क्या इस धरती पर आपसे भी अमीर कोई है ? बिल गेट्स ने जवाब दिया - हां, एक व्यक्ति इस दुनिया में मुझसे भी अमीर है। कौन -!!!!! बिल गेट्स ने बताया: एक समय मे जब मेरी प्रसिद्धि और अमीरी के दिन नहीं थे, मैं न्यूयॉर्क एयरपोर्ट पर था.. वहां सुबह सुबह अखबार देख कर, मैंने एक अखबार खरीदना चाहा,पर मेरे पास खुदरा पैसे नहीं थे.. सो, मैंने अखबार लेने का विचार त्याग कर उसे वापस रख दिया.. अखबार बेचने वाले लड़के ने मुझे देखा, तो मैंने खुदरा पैसे/सिक्के न होने की बात कही.. लड़के ने अखबार देते हुए कहा - यह मैं आपको मुफ्त में देता हूँ.. बात आई-गई हो गई.. कोई तीन माह बाद संयोगवश उसी एयरपोर्ट पर मैं फिर उतरा और अखबार के लिए फिर मेरे पास सिक्के नहीं थे।उस लड़के ने मुझे फिर से अखबार दिया, तो मैंने मना कर दिया। मैं ये नहीं ले सकता.. उस लड़के ने कहा, आप इसे ले सकते हैं, मैं इसे अपने प्रॉफिट के हिस्से से दे रहा हूँ.. मुझे नुकसान नहीं होगा। मैंने अखबार ले लिया...... 19 साल बाद अपने प्रसिद्ध हो जाने के बाद एक दिन मुझे उस लड़के की याद आयी और मैंने उसे ढूंढना शुरू किया। कोई डेढ़ महीने खोजने के बाद आखिरकार वह मिल गया। मैंने पूछा - क्या तुम मुझे पहचानते हो ? लड़का - हां, आप मि. बिल गेट्स हैं. गेट्स - तुम्हे याद है, कभी तुमने मुझे फ्री में अखबार दिए थे ? लड़का - जी हां, बिल्कुल.. ऐसा दो बार हुआ था.. गेट्स- मैं तुम्हारे उस किये हुए की कीमत अदा करना चाहता हूँ.. तुम अपनी जिंदगी में जो कुछ चाहते हो, बताओ, मैं तुम्हारी हर जरूरत पूरी करूंगा.. लड़का - सर, लेकिन क्या आप को नहीं लगता कि, ऐसा कर के आप मेरे काम की कीमत अदा नहीं कर पाएंगे.. गेट्स - क्यूं ..!!! लड़का - मैंने जब आपकी मदद की थी, मैं एक गरीब लड़का था, जो अखबार बेचता था.. आप मेरी मदद तब कर रहे हैं, जब आप इस दुनिया के सबसे अमीर और सामर्थ्य वाले व्यक्ति हैं.. फिर, आप मेरी मदद की बराबरी कैसे करेंगे...!!! बिल गेट्स की नजर में, वह व्यक्ति दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति से भी अमीर था, क्योंकि--- "किसी की मदद करने के लिए, उसने अमीर होने का इंतजार नहीं किया था ".... अमीरी पैसे से नहीं दिल से होती है दोस्तों किसी की मदद करने के लिए अमीर दिल का होना भी बहुत जरूरी है..!