Wednesday, December 27, 2023

कलयुग में साकार हो रहा है त्रेतायुग

सच बताएं आप मान लीजिएगा, त्रेतायुग में भगवान राम जब प्रकट हुए थे, तब भी शायद इतना बड़ा आयोजन न हुआ हो, जितना अब होने वाला है। जगह जगह से ऐसी ऐसी सूचनाएं आ रही हैं, जिन पर यकीन नहीं होता! देश के किसी मंदिर से कोई सामग्री आ रही है तो किसी से कुछ और! 


ऐसा कोई देश और राज्य नहीं जहां से खास सामग्री न आ रही हो। जिस जिस जगह राम के मानने वाले लोग हैं नेपाल, मारीशस, अमेरिका, इंडोनेशिया और न जाने किस किस देश से रामलला के लिए कौन कौन से उपहार आ रहे हैं ये बहुत ही अकल्पनीय है। बात हम अपने देश के आम श्रद्धालुओं की करें तो उनकी वे ही जानें! उनके दिलों में तो राम नाम पर सर्वस्व लुटाने की तमन्ना है। हम सभी को शताब्दियों बाद जो मिल रहे हैं श्रीराम।


कलयुग में साकार हो रहा है त्रेतायुग, रहा नहीं जा रहा बिन जाए, पर हम इंतजार करेंगे, करते रहेंगे देखिए मित्रों, यह शिकायत न कीजिए कि सोशल प्लेटफार्म पर राम पर बार बार क्यूं लिखा जा रहा है, यह तो लिखा जाएगा..! जैसे जैसे उद्घाटन के दिन पास आएंगे, बार बार खूब अच्छे अच्छे लेख लिखा जाएगा।


वस्तुतः राम पर वाल्मीकि और गोस्वामी तुलसीदास ने इतना लिख दिया है कि सामान्यजन का रोम रोम खिल उठा है। विश्वास नहीं हो रहा कि जो मंदिर पांच सौ सालों से नहीं बन पा रहा था, वह अब बन गया है। तो मन बार बार करता है कि चर्चा करें तो श्रीराम की करें, कलम उठाएं तो राम पर उठाएं। राम के ही गीत सुनें राम के ही नगमें गाएं .! तभी तो देखिए, पुरे देश में सर्वत्र राम चर्चा हो रही है ।


राम मंदिर पर फैसला शताब्दियों बाद आया, अब राम मंदिर निर्माण का कार्य बड़े जोर शोर से चल रहा है, मंदिर अभी उतना ही बना है कि दशकों तक तम्बू में बैठाए गए बालरूप राम को उसी स्थान पर स्थाई निवास मिले जहां त्रेता में उनका जन्म हुआ था, जहां बना उनका मंदिर 500 साल पहले तोड़ा गया था! सदियों तक अपमान का घूंट पीता देश अपने ही घर में अपनी ही अयोध्या में जिस दिन की प्रतीक्षा कर रहा था, वह दिन बहुत करीब है।


फिर भी न जाने क्यों, लगता है कि ये चंद दिन जल्दी बीत जाएं और भक्तों को राम की जन्मस्थली पर माथा टेकने का अवसर मिल जाए, उस पुण्यभूमि के अनुभव और स्पर्श का अवसर मिल जाए..! अवध धन्य है, अयोध्या धन्य है, बस हमारा जन्म भी धन्य हो जाए। हम सभी भाग्यशाली हैं कि हम इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण क्षणों के साक्षी बनने जा रहे हैं..! 


जय जय श्री राम!🙏



Wednesday, August 9, 2023

Dr Kalam Sahab the Great

 डीडी पोधिगई ने श्री पी एम नायर सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी के साथ एक साक्षात्कार प्रसारित किया जो डॉ. कलाम सर के सचिव थे जब वह राष्ट्रपति थे। उन्होंने भावुकता से भरी आवाज में जो बातें कहीं, उन्हें मैं संक्षेप में प्रस्तुत करता हूं। श्री नायर ने "कलाम इफेक्ट" नामक पुस्तक लिखी....


डॉ. कलाम जब भी विदेश जाते थे तो उन्हें महंगे उपहार मिलते थे क्योंकि कई देशों में अपने दौरे पर आने वाले राष्ट्राध्यक्ष को उपहार देने की प्रथा है। उपहार को अस्वीकार करना राष्ट्र का अपमान और भारत के लिए शर्मिंदगी बन जाएगा। इसलिए, उन्होंने उन्हें प्राप्त किया और उनके लौटने पर, डॉ. कलाम ने उपहारों की तस्वीरें खींचने और फिर उन्हें सूचीबद्ध करके अभिलेखागार को सौंपने के लिए कहा। उसके बाद उसने कभी उनकी ओर देखा तक नहीं। राष्ट्रपति भवन छोड़ते समय उन्होंने मिले उपहारों में से एक पेंसिल भी नहीं ली।


2002 में, जिस साल डॉ. कलाम ने राष्ट्रपति पद संभाली, रमज़ान का महीना जुलाई-अगस्त में आता था। राष्ट्रपति के लिए इफ्तार पार्टी की मेजबानी करना एक नियमित अभ्यास था। डॉ कलाम ने श्री नायर से पूछा कि उन्हें उन लोगों के लिए एक पार्टी की मेजबानी क्यों करनी चाहिए जो पहले से ही अच्छी तरह से खा चुके हैं और उनसे यह पता लगाने के लिए कहा कि इसकी लागत कितनी होगी। श्री नायर ने बताया कि इसकी कीमत करीब 10 लाख रुपये है। 22 लाख.डॉ कलाम ने उनसे उस राशि को भोजन, कपड़े और कंबल के रूप में कुछ चयनित अनाथालयों को दान करने के लिए कहा।  अनाथालयों का चयन राष्ट्रपति भवन की एक टीम पर छोड़ दिया गया था और इसमें डॉ. कलाम की कोई भूमिका नहीं थी।  चयन होने के बाद, डॉ कलाम ने श्री नायर को अपने कमरे के अंदर आने के लिए कहा और उन्हें 1 लाख रुपये का चेक दिया।  उन्होंने कहा कि वह अपनी निजी बचत से कुछ रकम दे रहे हैं और इसकी जानकारी किसी को नहीं दी जानी चाहिए.  मिस्टर नायर इतने हैरान हुए कि उन्होंने कहा, "सर, मैं बाहर जाऊंगा और सबको बताऊंगा। लोगों को पता होना चाहिए कि यहां एक आदमी है जिसने न केवल वह दान किया है जो उसे खर्च करना चाहिए था बल्कि वह अपना पैसा भी दे रहा है"।  यद्यपि डॉ. कलाम एक कट्टर मुस्लिम थे, लेकिन जिन वर्षों में वे राष्ट्रपति थे, उन्होंने इफ्तार पार्टियाँ नहीं आयोजित कीं।


डॉ कलाम को "यस सर" टाइप के लोग पसंद नहीं थे! एक बार जब भारत के मुख्य न्यायाधीश आये थे और किसी बात पर डॉ. कलाम ने अपने विचार व्यक्त किये और श्री नायर से पूछा, "क्या आप सहमत हैं?" श्री नायर ने कहा "नहीं सर, मैं आपसे सहमत नहीं हूँ"। मुख्य न्यायाधीश हैरान रह गए और उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। एक सिविल सेवक के लिए राष्ट्रपति से असहमत होना असंभव था और वह भी इतने खुले तौर पर।  श्री नायर ने उनसे कहा कि राष्ट्रपति बाद में उनसे पूछेंगे कि वे असहमत क्यों हैं और यदि कारण 99% तार्किक है तो वह अपना विचार बदल देंगे।

डॉ. कलाम ने अपने 50 रिश्तेदारों को दिल्ली आने का निमंत्रण दिया और वे सभी राष्ट्रपति भवन में रुके।  उन्होंने उनके लिए शहर में घूमने के लिए एक बस की व्यवस्था की जिसका भुगतान उन्होंने किया। किसी सरकारी कार का इस्तेमाल नहीं किया गया! उनके रहने और खाने का सारा हिसाब डॉ. कलाम के निर्देशानुसार किया गया और बिल 2 लाख रुपये आया, जिसे उन्होंने चुका दिया। इस देश के इतिहास में ऐसा किसी ने नहीं किया.!

अब चरमोत्कर्ष की प्रतीक्षा करें, डॉ. कलाम के बड़े भाई पूरे एक सप्ताह तक उनके साथ उनके कमरे में रहे क्योंकि डॉ. कलाम चाहते थे कि उनका भाई उनके साथ रहे। जब वे चले गए तो डॉ. कलाम उस कमरे का किराया भी देना चाहते थे।  कल्पना कीजिए कि देश का राष्ट्रपति उस कमरे का किराया दे रहा है जिसमें वह रह रहा है। यह किसी भी तरह से कर्मचारियों द्वारा सहमत नहीं था, जिन्होंने सोचा था कि ईमानदारी को संभालना बहुत मुश्किल हो रहा है!

जब कलाम सर को कार्यकाल के अंत में राष्ट्रपति भवन छोड़ना था, तो हर स्टाफ सदस्य उनसे जाकर मिला और उन्हें सम्मान दिया। श्री नायर अकेले ही उनके पास गए क्योंकि उनकी पत्नी के पैर में फ्रैक्चर हो गया था और वह बिस्तर पर थीं। डॉ. कलाम ने पूछा कि उनकी पत्नी क्यों नहीं आईं। उन्होंने जवाब दिया कि वह एक दुर्घटना के कारण बिस्तर पर थी।  अगले दिन, श्री नायर ने अपने घर के आसपास बहुत सारे पुलिस वालों को देखा और पूछा कि क्या हुआ था। उन्होंने कहा कि भारत के राष्ट्रपति उनसे मिलने उनके घर आ रहे हैं। वह आकर अपनी पत्नी से मिले और कुछ देर बातचीत की। श्री नायर का कहना है कि किसी भी देश का राष्ट्रपति किसी सिविल सेवक के घर नहीं जायेगा और वह भी इतने साधारण बहाने से।

मैंने सोचा कि मुझे विवरण देना चाहिए क्योंकि आप में से कई लोगों ने प्रसारण नहीं देखा होगा और इसलिए यह उपयोगी हो सकता है। 

एजेपी अब्दुल कलाम के छोटे भाई छाता रिपेयरिंग की दुकान चलाते हैं। जब श्री नायर कलाम के अंतिम संस्कार के दौरान उनसे मिले, तो उन्होंने श्री नायर और भाई दोनों के सम्मान में उनके पैर छुए...!

Thursday, March 2, 2023

बिहार का कुख्यात चंपा विश्वास बलात्कार कांड:-

 वर्ष 1947 में भारत को तथाकथित स्वतंत्रता मिलने के पश्चात भारत के मध्य-पूर्व के राज्य बिहार की राजनीति उसके सामंती धरातल से उभरी जिसने न केवल राज्य स्तर पर बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर अनेक बाहुबलियों, भ्रष्टाचारियों एवं अपराधियों को पैदा किया एवं अन्य क्षेत्रों के अपराधियों को अपने

यहां पनाह दी।इसका परिणाम यह हुआ कि बिहार समेत पूरे राष्ट्र को इस भ्रष्टाचारी एवं अपराधिक राजनैतिक परिवेश की भारी क़ीमत चुकानी पड़ी। यही कारण है कि एक समय आर्यावर्त की सबसे उपजाऊ बौद्धिक व सांस्कृतिक विरासत की थाती रही बिहार-भूमि आज भारत के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में शुमार होती है।

बिहार की इस सामाजिक दुर्दशा के पीछे कोई और नहीं बल्कि स्वयं बिहारवासी ही दोषी हैं जिन्होंने अपने तुच्छ जातिगत, वर्गगत, क्षेत्रगत एवं समाजगत स्वार्थों की क्षणिक-पूर्ति के लिए अपनी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को चौपट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी एवं महान राष्ट्र आर्यावर्त की बेहद संपन्न-भूमि को शेष विश्व के समक्ष अपमानित व शर्मसार करने का महापाप किया।

बिहारवासियों के इन्हीं स्वार्थपरक ग़लत निर्णयों के कारण आज से लगभग तीन दशक पहले बिहार के अपराधी एवं भ्रष्टाचारी नेता लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में राज्य में एक ऐसे ‘जंगलराज’ की वापसी हुई जिसने लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व के नंद-वंशीय निरंकुश कुशासन की भयावह कुस्मृतियाँ ताज़ा कर दीं। हो सकता है कि आज की नई पीढ़ी को तीन दशक पहले बिहार में हुए उस भयावह ‘नग्न जंगल-नृत्य’ के विषय में अधिक जानकारी न हो लेकिन इस लेख में संदर्भित की गई इस एक कहानी को 

पढ़कर ही उसे बिहार की तत्कालीन राजनीतिक एवं सामाजिक दुर्दशा के विषय में काफ़ी कुछ जानकारी प्राप्त हो सकती है-


बिहार का कुख्यात चंपा विश्वास बलात्कार कांड:-


वर्ष 1998 में बिहार में समाज कल्याण विभाग में सचिव के पद पर तैनात वर्ष 1982 बैच के सीनियर आईएएस अधिकारी बी० बी० विश्वासकी 30 वर्षीया पत्नी चंपा विश्वास ने आरोप लगाया कि तत्कालीन राजद विधायक एवं समाज कल्याण बोर्ड की चेयरमैन हेमलता यादव, जिनका कि सरकारी आवास उनके आवास के पास में ही स्थित था, के 27 वर्षीय अपराधी पुत्र मृत्युंजय यादव और उसके साथियों ने आपराधिक दबाव बनाकर उनके साथ दो साल से अधिक समय तक लगातार हिंसक तरीके से बलात्कार किया। चंपा विश्वास ने यह भी ख़ुलासा किया कि एक बार उनका ज़बरन गर्भपात भी कराया गया जिसके बाद गर्भ ठहरने के बचाने के लिए बलात्कारियों ने उनकी नसबंदी तक करवा दी। काफ़ी लंबे समय तक चले शारीरिक, मानसिक एवं यौन-प्रताड़नाओं के दौर से तंग आकर जब चंपा विश्वास ने इसका विरोध किया तो मृत्युंजय यादव और उसके साथियों ने उनको डराया-धमकाया और मुंह खोलने पर जान से मारने की धमकी भी दी परंतु तब तक चंपा विश्वास मृत्युंजय यादव और उसके साथियों के उत्पीड़न से इस क़दर परेशान आ चुकी थीं कि उन्होंने इस अपनी पीड़ा को बाहर

मीडिया में सार्वजानिक करना ही उचित समझा।इससे पहले उनके पति बी० बी० विश्वास लालू प्रसाद यादव से बलात्कारी मृत्युंजय यादव एवं उसके बाक़ी बलात्कारी साथियों की शिकायत कर चुके थे जिसके जबाब में लालू प्रसाद यादव ने उनको अपना मुंह बंद रखने की सख़्त हिदायत देते हुए बलात्कारियों के साथसमझौता करने का सुझाव दिया था। इतना ही नहीं, बलात्कारियों की सी भाषा बोलते हुए जंगलाधीश लालू प्रसाद यादव ने बी० बी० विश्वास को समझौता न करने की स्थिति में इस मामले में किसी प्रकार की कोई भी कार्यवाही न होने और उनको परिवार समेत गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी थी।

उसके बाद क्या था, जैसे ही चंपा विश्वास ने अपने साथ हुए बर्बरतापूर्ण बलात्कारों की त्रासदी को बयां करते हुए जब तत्कालीन बिहार सरकार के ‘जंगलराज’ की कलई खोलनी शुरू की तो बिहार के साथ पूरे भारत के राजनीतिक गलियारों में हडकंप मच गया। इस घटना से पूरे देश के ज़ेहन में सहसा ही वर्ष 1983 के बिहार के चर्चित ‘बॉबी सेक्स-स्कैंडल एवं हत्याकांड’ की यादें ताज़ा हो उठीं जब बिहार विधानसभा सचिवालय में टाइपिस्ट रहीं बॉबी उर्फ़ निशा त्रिवेदी की, बिहार के ही कद्दावर अपराधी एवं बलात्कारी कांग्रेसी नेताओं ने बर्बरतापूर्ण बलात्कार करने के बाद निर्मम हत्या कर दी थी।

उस केस में भी बिहार के तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र एवं भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री मैमूना बेगम उर्फ़ इंदिरा गांधी ने पूर्व की भांति अपने कांग्रेसी दुश्चचरित्र का प्रदर्शन करते हुए उक्त घटना को अपने विश्वस्त प्रशासनिक कर्मचारियों की सहायता से दबवा दिया था।

इस ख़ुलासे के बाद चंपा विश्वास ने कई अन्य ख़ुलासे भी किए। चंपा विश्वास ने बताया कि सिर्फ़ उनके साथ ही बलात्कार नहीं हुआ था बल्कि उनके साथ-साथ उनकी मां, उनकी ननद, उनके पति बी० बी० विश्वास की भतीजी कल्याणी एवं उनके गृहकार्यों में मदद करने वाली उनकी दो सहायिकाओं के साथ भी आतताई जंगली भेड़िए मृत्युंजय यादव और उसके साथियों ने निर्दयतापूर्वक बलात्कार किया था। इतना ही नहीं, उनके मुताबिक़ तत्कालीन बिहार सरकार के संरक्षण प्राप्त बलात्कारियों ने उनकी भतीजी कल्याणी एवं उनकी दोनों सहायिकाओं को ग़ायब भी करवा दिया था। उन्होंने ये शंका भी ज़ाहिर की कि इतने लंबे समय बाद भी उनकी बरामदगी का न हो पाना ये इंगित करता है कि उनको बलात्कारियों ने मार डाला था।

चूंकि बलात्कारी मृत्युंजय यादव ने बिहार के तत्कालीन जंगली मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की बायोग्राफ़ी लिखी थी, इसलिए वह उनका बेहद क़रीबी एवं प्रिय था। शायद यही कारण था कि 

चंपा विश्वास के द्वारा बलात्कार की शिकायत प्राप्त होने पर भी बिहार का शासन-प्रशासन उसके ऊपर कोई भी कार्यवाही करने से बच रहा था। इस घटना के तीन साल पहले भी बिहार पुलिस ने मृत्युंजय यादव को एक अन्य राजनेता की बेटी का यौन-शोषण करने के आरोप में गिरफ़्तार किया था परंतु उस समय वहकिसी तरह क्षमा मांगकर बच निकला था। यह मामला भी बिहार पुलिस की फाइल में कहीं दब और समय के साथ मर जाता यदि चंपा विश्वास ने बिहार के तत्कालीन राज्यपाल सुंदर सिंह भंडारी को चिट्ठी लिखकर अपने और अपने परिवार के साथ हुई त्रासदी की सूचना नहीं दी होती।

जब चंपा विश्वास और उनके पति बी० बी० विश्वास ने अपने ऊपर हुए ‘जंगली-अत्याचारों’ की पूरी कहानी का संपूर्ण ब्योरा बिहार के तत्कालीन राज्यपाल को सौंपा तो उसके बाद उनकी इस शिकायत पर राज्यपाल ने केंद्रीय गृह मंत्रालय से इस मामले में उचित कार्रवाई करने का अनुरोध करते हुए लालू प्रसाद यादव के प्रिय अधिकारी रहे तत्कालीन डीजीपी (प्रशासन) मोहम्मद नियाज़ अहमद को पुलिस जांच करवाने का आदेश दिया। संभवतः यह पूरे देश में अब तक का पहला ऐसा मामला था कि जिसमें एक आईएएस अधिकारी की पत्नी एवं उसके घर के सदस्यों का उसके ही घर में यौन-शोषण हुआ था और वह उनकी रक्षा कर पाने में पूर्णतः असहाय सिद्ध हुआ था। इतना ही नहीं, इस मामले में भारत की पूरी की पूरी ब्यूरोक्रेसी भी सरकारी संरक्षण प्राप्त एक जंगली बलात्कारी के आगे एकदम निस्सहाय महसूस कर रही थी।

जब उपरोक्त मामले की शिकायत के काफ़ी दिनों बाद भी बिहार के तत्कालीन ‘जंगली-प्रशासन’ ने उक्त मामले 

में कोई महत्वपूर्ण क़दम नहीं उठाया एवं बलात्कारियों की तरफ़ से विश्वास दम्पति को जान से मारने की धमकियां मिलनी शुरू हो गईं तो उसके बाद अपने परिवार की सुरक्षा को देखते हुए आईएएस अधिकारी बी० बी० विश्वास को मजबूरी में दिल्ली पलायन करना पड़ा। उसके बाद भी बलात्कारी मृत्युंजय यादव 

ने विश्वास दम्पति के जले पर नमक छिड़कते हुए बयान दिया कि बिहार की राजनीति में ऐसे आरोप कई बार फ़ायदेमंद हो जाते हैं।

इस बलात्कार कांड ने बिहार समेत पूरे भारत के समाज की अंतरात्मा को सिरे से झकझोर कर रख दिया। लोग आश्चर्य में पड़ गए कि बिहार में जब एक आईएएस अधिकारी भी अपनी 

पत्नी की इज़्ज़त नहीं बचा पाया तो ‘बिहार के जंगलराज’ में वहां की आम जनता अपनी बहू-बेटियों की इज़्ज़त को लालू प्रसाद यादव के सरकारी बलात्कारी भेड़ियों की हवस से कैसे सुरक्षित रख पाती होगी?

भले ही इस कांड ने बिहार समेत पूरे देश को हिला कर रख दिया था पर बिहार ने इस कांड से कुछ नहीं सीखा। कुछ समय बाद ही वर्ष 1999 में बिहार में पुनः देश की आत्मा को झकझोर कर रख देने वाला ‘शिल्पी जैन-गौतम सेक्स स्कैंडल एवं हत्याकांड’ सामने आया। पूर्व की तरह इस ‘जंगल-कांड’ के तार भी ‘बिहार के जंगलराज’ के मुखिया लालू प्रसाद यादव के एक अति प्रिय नेता से जुड़े पाए गए जिसे उनके द्वारा उनकी मुख्यमंत्री पत्नी राबड़ी देवी की बादशाही के चलते मैनेज कर लिया गया।

ख़ैर ‘बिहार के जंगलराज’ की ऐसी न जाने कितनी ज्ञात-अज्ञात कहानियां हैं जिनके बारे में यदि लिखा जाए तो शायद कभी भी उनका समापन नहीं किया जा सकता है परंतु बिहारवासियों से ऐसी तो आशा की ही जा सकती है कि वे अपने पूर्व-इतिहास व अपने पूर्वजों के द्वारा की गयी भयंकर भूलों से सबक़ लेते हुए अपने एवं अपनी अगली पीढ़ियों के भविष्य को स्वयं बर्बाद नहीं करेंगे एवं वे अपने मत का सही प्रयोग करते हुए अपने लिए ‘पहले से एक बेहतर राजनीतिक परिदृश्य’ तैयार करने का प्रयास करेंगे।

बिहार का जंगलराज:- शिल्पी जैन-गौतम सिंह बलात्कार एवं हत्याकांड

 बिहार का जंगलराज:- शिल्पी जैन-गौतम सिंह बलात्कार एवं हत्याकांड…


03 जुलाई, सन 1999 को बिहार के प्रतिष्ठित व्यवसायी उज्ज्वल कुमार जैन की बेहद ख़ूबसूरत बेटी शिल्पी जैन एवं उनके मित्र गौतम सिंह की लाशें पटना के फ्रेज़र रोड स्थित एक क्वार्टर के गैराज से बरामद हुईं। यह क्वार्टर उस वक़्त राज्य की सत्तानशीं पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के विधायक एवं बिहार के अपराधी नेता लालू प्रसाद यादव के साले साधु यादव का था। एक ओर जहां शिल्पी जैन के पिता उज्ज्वल कुमार जैन स्थानीय व्यावसायिक संस्थान कमला स्टोर के मालिक थे तो वहीं दूसरी ओर गौतम सिंह के पिता बी० एन० सिंह राजद के बड़े नेताओं के बेहद क़रीबी माने जाते थे। विदित रहे कि बी० एन० सिंह ने चारा घोटालेबाज़ लालू प्रसाद यादव के द्वारा अंजाम दिए गए चारे घोटाले का धन हवाला-सूत्रों के माध्यम से विदेशी बैंकों में जमा करवाने का कार्य किया था। व्यवसायी उज्ज्वल कुमार जैन की बेटी शिल्पी जैन पटना के विमेंस कॉलेज की छात्रा थीं और गौतम सिंह उनके बॉयफ्रेंड थे। गौतम सिंह और लालू यादव के विधायक साले साधू यादव, फ्रेज़र रोड में स्थित सिल्वर ओक रेस्टोरेंट में बिज़नेस पार्टनर्स थे।


03 जुलाई, सन 1999 के दिन शिल्पी जैन और गौतम सिंह पिछले करीब 8 घंटों से लापता थे और अचानक जब उनकी 

लाशें विधायक अपराधी नेता साधु यादव के फ्लैट से मिलीं तो पूरे बिहार में हड़कंप मच गया। सियासी कनेक्शन होने के कारण देखते ही देखते यह ख़बर पूरे बिहार में आग की तरह फैल गई। मौक़े पर उपस्थित प्रत्यक्षदर्शी लोग बताते हैं कि पुलिस के गैराज तक पहुंचने से पहले ही राष्ट्रीय जनता दल के

विधायक साधु यादव के गुंडे वहां पर पहुंच गए और उन्होंने वहां जमकर हंगामा खड़ा कर दिया। सबसे ज़्यादा हैरानी तो उस वक़्त तब हुई जब उजले रंग की जिस मारुति ज़ेन में शिल्पी और गौतम की लाशें मिली थीं, उस गाड़ी को पुलिस खींचकर नहीं बल्कि ड्राइव करके ले गई थी। इसका परिणाम यह हुआ कि एक संदिग्ध कार को मौका-ए-वारदात से ड्राइव करके ले जाने की वजह से गाड़ी से काफ़ी फिंगर प्रिंट्स मिट गए थे। पुलिस जब इस मामले की जांच में जुटी तो निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले ही पुलिस ने दोनों मौतों को आत्महत्या बताना शुरू कर दिया।


पुलिस की थ्योरी के मुताबिक शिल्पी जैन और गौतम सिंह

की मौत कार्बन-मोनो-ऑक्साइड गैस की वजह से हुई थी लेकिन शिल्पी और गौतम के विसरा रिपोर्ट से ख़ुलासा हुआ कि दोनों के शरीर में लीथल एल्युमिनियम ज़हर था। इतना ही नहीं, कई लोगों ने यह भी दावा किया था कि शिल्पी के शरीर पर नोचने एवं जूतों से पीटे जाने के निशान भी मौजूद थे लेकिन पुलिस इस बात से हमेशा इनकार करती रही। उपरोक्त तथ्यों के अतिरिक्त भी इस मामले में एक और अहम तथ्य पाया गया था जिसे कि बिहार पुलिस ने बहुत ही सावधानी से छुपाने एवं हल्का करने का प्रयास किया। दरअसल शिल्पी के शरीर पर एक से ज्यादा लोगों के वीर्य के सैंपल भी पाए गए थे। शिल्पी का Vaginal Fluid, जो डीएनए टेस्ट के लिए हैदराबाद स्थित प्रयोगशाला में भेजा गया था, उसकी रिपोर्ट में यह ख़ुलासा हुआ था कि मौत से पहले शिल्पी के साथ एक से अधिक लोगों ने सामूहिक-बलात्कार किया था। ज़ाहिर सी बात है कि हत्या से पहले शिल्पी जैन के साथ लालू प्रसाद यादव के गुंडे एवं 

बलात्कारी साले साधु यादव और उसके गैंग के गुंडों ने सामूहिक बलात्कार किया था लेकिन बिहार पुलिस ने उन्हें बचाने के लिए इन समस्त सबूतों को झुठलाने और दबाने का कार्य किया। उस समय के एसपी सिटी यह नहीं बता पाए कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में कैसे शिल्पी के शरीर पर एक से अधिक व्यक्तियों के वीर्य के मौजूद होने की पुष्टि हुई? 


उस वक़्त दबी ज़ुबान में इस बात की भी चर्चा थी कि जिस 03 जुलाई, सन 1999 के दिन शिल्पी जैन और गौतम सिंह की लाशों की बरामदगी गांधी मैदान थाना के अंतर्गत जिस विधायक आवास से हुई थी, वास्तविकता में उस दिन और उस स्थान पर इन दोनों की हत्याएं नहीं की गई थीं। अन्वेषणकर्ताओं के अनुमान के मुताबिक़ इन दोनों की हत्याएं, लाशों की बरामदगी से एक दिन पहले यानी कि 02 जुलाई, सन 1999 को नगर के बालमी नामक स्थान पर की गई थीं परंतु अज्ञात कारणों से दोनों लाशों की बरामदगी, साधु यादव के फ्लैट से हुई दिखाई गई। कुछ लोगों का ऐसा भी कहना है कि इन लाशों की बरामदगी किसी और स्थान से दिखाई जानी थी अथवा लाशों को नष्ट किया जाना था परंतु संभवतः किसी के द्वारा दोनों की लाशों को साधु यादव की गैराज में देख लिए जाने के कारण ऐसा किया जाना संभव न हो सका और मजबूरी में वहीं पर लाशों की बरामदगी दिखानी पड़ गयी।


काफ़ी समय तक चली जांच के पश्चात यह मामला केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई के पास भी गया। सीबीआई द्वारा इस मामले की जांच की प्रक्रिया में एक बार जांचकर्ताओं ने साधु यादव से उनका डीएनए सैंपल भी मांगा ताकि शिल्पी के डीएनए से उसका मिलान किया जा सके परंतु सरकारी सिस्टम के अंदर लालू प्रसाद यादव की ज़बरदस्त पैठ के चलते संबंधित जांचकर्ता अधिकारी साधु यादव का डीएनए सैंपल प्राप्त नहीं कर सके। इसके बाद इस मामले में आगे चली जांच प्रक्रिया में आरोपियों की पहचान भी उजागर नहीं की गई थी और बाद में कोर्ट में चली सुनवाई के दौरान आरोपियों को क्लीन चिट भी प्रदान कर दी गई। कुछ वर्षों के बाद शिल्पी जैन के भाई ने जब इस केस को फिर से खुलवाने और इसकी जांच करवाने के प्रयास करने शुरू किए तो उसके बाद उनका भी अपहरण हो गया।


कुल-मिलाकर इस पूरे घटनाक्रम का यह परिणाम निकला कि आज तक इस केस के पीछे के असली अपराधियों का नाम आधिकारिक रूप से प्रकाश में नहीं आ पाया और क़ानून की रोशनी में शिल्पी जैन तथा गौतम सिंह की हत्या का रहस्य अनसुलझा ही रह गया। फ़िलहाल, बिहारवासियों से ऐसी आशा की जाती है कि पूर्व में बिहार के ‘जंगलराज’ के दौरान घटी ऐसी हृदय-विदारक एवं मानवता-विरोधी घटनाओं से सबक़ लेते हुए वे भविष्य में कभी भी बिहार एवं राष्ट्र के हितों के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे एवं बिहार के राजनैतिक एवं सामाजिक परिदृश्य को अपराधियों, बलात्कारियों, गुंडों, लफंगों एवं आतंकवादियों से सदैव मुक्त रखने के लिए अपने हर-संभव प्रयास करेंगे।


Thursday, January 5, 2023

"Dumraon Raj Pariwar"

Dumraon Raj was a medieval chieftaincy and later a zamindari estate in erstwhile Shahabad district of Bihar, now in Buxar district.


The founders of Dumraon Raj were Ujjainiya Rajputs who traced their origin to the Parmar rulers of Malwa who moved to Western Bihar in the 13th century. The founder of the family was Santana Shahi who settled here while returning from Gaya after offering pind daan.


In 1745 Raja Horil Singh shifted the headquarters of his capital from Naurattan Garh in Bhojpur to Dumraon.


The next great chief of the Dumraon family was Raja Bikramjit Singh, who was given the title of Raja by the emperor Shah Alam in 1771. He was succced by his son Maharaja Bahadur Jai Prakash Singh in 1816.


In 1881 Radha Prasad Singh succeeded to the gaddi of Dumraon Raj and the title of Maharaj Bahadur was conferred on him in 1882  in precedence of the zamindars of Bettiah, Hathuwa and Darbhanga.


He was the head of the Rajputs in Shahbad and did valuable service during the famine of 1873-74. He was subsequently made K.C.I.E ( Knight Commander of the Indian Empire). His only daughter was married to Maharaj Venkat Raman Singh of Rewa.


On the death of Maharaja Radha Prasad Singh in 1894, the Dumraon Raj was placed under the management of Court of Wards but soon Maharani Beni Prasad  Kuari, the widow of late Maharaja, took it back and managed the affairs of the Raj till her death in 1907.


Due to the absence of direct male descendant, the Raj was engaged in a prolonged litigations. In 1911, after obtaining a decree in his favour from Sub-judge's Court in Arrah, Sri Keshav Prasad Singh got the possession of the Dumraon Raj from the Court of Wards.


He was conferred with the title of Maharaja Bahadur and Knighthood. He was also a member of the Executive Council of the Governor of Bihar. Paigambar Baksh Khan, father of the Shehnai Maestro Bharat Ratna Bismillah Khan was the court musician in his court. Bismillah Khan was born in Dumraon in 1916 and spent his early childhood there before moving to Banaras.


After his death in 1933, he was succeeded by Maharaja Rama Ranvijay Prasad Singh, who was further succeeded by his son Maharaja Kamal Singh in 1949.


It was during the regime of Maharaja Kamal Singh that the Zamindari system was abolished by the Bihar Land Reforms Act, 1950 and the possession of the zamindari villages of Dumraon Raj were handed to the Bihar government in 1952. He was also an industrialist and had sponsored a lantern factory and a cold storage at Dumraon.


The last Maharaja of Dumraon Raj in Bihar.

Maharaja Kamal Singh Elected from 1952 to 1962, he was the youngest MP and the last surviving member of the first Lok Sabha. He was known for his welfare works and bond with Atal Bihari Vajpayee. 


Dumraon Raj had sponsored a number of religious and charitable institutions for maintaining beautiful temples, hospitals, schools and educational institutions at Dumraon, Bikramganj and Arrah.

Remnants of this Raj can be traced at various locations including Bihta, Jagdisgpur, Bhojpur, Buxar and Patna.


Source - Bihar District Gazetteers: Shahabad)


Thursday, December 8, 2022

प्रेम में भावुकता पन!

हम जीवन में बहुत कुछ सीखते हैं। इनमें एक ज़रुरी चीज़ है इमोशनल मैनेजमेंट। अक्सर मज़बूत और समझदार समझे जाने वाले लोग भी अतिभावुकता में अपना नुकसान कर बैठते हैं। भावुक होना अच्छा है, लेकिन ख़ुद को दुख पहुंचाना किसी सूरत अच्छा नहीं।


सबसे ज़्यादा सेल्फ-हार्मिंग होता है प्रेम में टूटना। प्रेम..जिसके लिए तमाम आदर्श स्थापित है। बड़ी सुंदर सुंदर बातें पढ़ी-सुनी हैं हमने। लेकिन असल में ‘प्रेम’ के नाम पर ही तमाम खेल भी होते हैं। खिलाड़ी का कुछ नहीं बिगड़ता, मगर जिसके साथ खेला गया है वो जाने कितनी देर तक फुटबॉल की तरह इधर-उधर लुढ़कता रह जाता है। अरसे तक तो अस्वीकार की स्थिति ही बनी रहती है, और फिर उसके बाद नैराश्य, अवसाद, उदासी, अविश्वास जैसे तमाम भाव उपजने लगते हैं। कई बार तो मेडीकल कंडीशन तक बन जाती है। इसीलिए हमें अपने भावपक्ष पर काम करना बहुत ज़रूरी है।


आज के समय जब तमाम रिश्तों की परिभाषाएं बदल रही हैं, प्रेम भी इससे अछूता नहीं। पहले तो वो ‘प्रेम’ है..ये तय करना मुश्किल। डेटिंग एप्स के बाज़ार सजने के बाद तो ये खेल और ज़ोर शोर से जारी है। इसीलिए कुछ बातों को समझना ज़रूरी है। इन नई ‘terminology’ को जानना चाहिए, ताकि कभी इससे गुज़रे तो पता हो कि हमारे साथ दरअस्ल हो क्या रहा है।  इमोशनल होना अच्छा है, लेकिन इस कारण बेवकूफ न बनें।


पवित्र, सच्चा, बिना शर्त, प्लेटोनिक प्रेम की अव्यावहारिकता से बाहर आकर इन स्थितियों को समझिए- 


Gaslighting -  ‘गैसलाइटिंग’ को वर्ड ऑफ द ईयर के रूप में चुना गया है। सरल शब्दों में इसका मतलब अपने फायदे के लिए दूसरे को भरमाना है। इसमें एक पक्ष दूसरे के साथ मनोवैज्ञानिक तौर पर खेलता है। किसी को इस तरह से भ्रमित कर दिया जाए कि पीड़ित शख्स अपने विचारों पर, अपनी काबिलियत पर शक़ करने लगे। ये किसी भी तरह के संबंधों में किया जा सकता है।


Pocket Relationship – इसमें ज्यादातर एक पक्ष (कभी कभी दोनों भी) अपने रिश्ते को छिपाकर रखना चाहते हैं। जैसे कपड़ों के पॉकेट चीजें छिपाई जाती है, उसी तरह। जब बात दोतरफ़ा हो तो ठीक है, लेकिन अगर एक पार्टनर ऐसा कर रहा है बिना किसी जायज़ वजह के, तो आप एक असुरक्षित रिश्ते में हैं।


Situationship - प्रॉपर रिलेशनशिप से कम लेकिन कैजुएल रिलेशनशिप से ज्यादा। एक या दोनों पार्टनर के मन में फीलिंग है, लेकिन वो इसे स्वीकारने को तैयार नहीं। आप न ऑफिशियली रिलेशनशिप में हैं, न ही ये दोस्ती भर है। अक्सर ऐसा एक पार्टनर के साथ होता है कि वो भावनाओं से भर जाता है लेकिन सामने वाले पर कोई असर नहीं। यहां दोनों के बीच रोमांस भी है, लेकिन इसे कमिट नहीं करना है। ये स्थिति तब खतरनाक है जब कोई एक पार्टनर इमोशनल हो और दूसरे को रत्ती भर फर्क न पड़े।


Breadcrumbing – किसी के द्वारा रोमांटिक या फ्लर्टिंग वाले संदेश-संकेत देना, लेकिन नॉन-कमिटेड होकर। कभी आपको लेकर वो एकदम से उत्साहित, प्रेमिल हो जाए और फिर कुछ ही समय बाद व्यवहार एकदम ठंडा पड़ जाए। आप कन्फ्यूज़ रहें कि आप दोनों के बीच आख़िर है क्या। यह इमोशनल हेल्थ को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है।


Love Bombing - लव बॉम्बिंग शुरू में अच्छी लग सकती है। इसमें एक पार्टनर दूसरे के लिए अत्यधिक केयरिंग और प्रेमिल हो जाता है। जैसे प्यार का बम फोड़ दिया हो। धीरे-धीरे उसे खुदपर निर्भर और बाध्य महसूस कराने लगता है। पहले आपको प्यार से लबरेज़ कर देता है और फिर कुछ समय बाद उसका व्यवहार बदल जाता है। आप जैसे मझधार में फंस जाते हैं।


Ghosting – अचानक ही, बिना किसी कारण के आपसे सारे संबंध संपर्क खत्म कर देना। हर जगह से गायब हो जाना। असल जीवन से लेकर मैसेज, कॉल और तमाम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से अचानक नदारद हो जाना। यहां आप ख़ुद से पूछते ही रह जाएंगे कि आख़िर हुआ क्या है, आपकी ग़लती क्या है। इन सवालों के जवाब कभी नहीं मिलेंगे।


PS : ऐसी तमाम और बातें हैं और ये किसी के साथ भी हो सकता है। इसमें कोई जेंडर निर्धारित नहीं। बस जो पक्ष सच्चा-सरल होगा, वो परेशान रहेगा। जो खेल रहा है, वो खेलकर निकल जाएगा। इसीलिए खुद को इमोशनल टॉर्चर से बचाइये और अपनी मेंटल हेल्थ पर ध्यान दीजिए। आप सबसे अहम हैं..ये याद रखिए।

Tuesday, November 15, 2022

हमारा काम तो बस किरदार निभाते रहना है!

 “चलता है…सब कुछ चलता है....एक वक़्त ऐसा आता है जब तुम कुछ नहीं करना चाहते....!


जब जैसे भी हालात हो, कोई कुछ भी कहे…कोई कुछ भी करे…तुम बस जो चल रहा है उसे वैसे ही चलने देना चाहते हो।

सब कुछ जैसे छोड़ देते हो। कभी ये सोचते हो कि मेरे कुछ कहने और करने से फ़र्क़ ही क्या पड़ेगा..!


You know you easily except everything..!

तुम्हारे ज़हन में ये आता है कि ठीक है ना कितना कर सकते हैं…कितना अपने हिसाब से आप कहानी में बदलाव ला सकते हैं।

अंत में जिसने लिखी है उसने सब अपने हिसाब से ही करना है तुम्हारे और मेरे सोचने से कुछ होने ही नहीं वाला..!

तो जब कल सुबह उठने के बाद होने क्या वाला है उसका अंदाज़ा ही नही है तो क्यों ना जो जैसे चल रहा है उसे वैसे ही चलने दिया जाए..!

इस बात की फ़िक्र करे बिना कि कितना हो पायेगा,क्या जैसा सोचा है वैसा हो पायेगा? बात वैसे बन पायेगी?

क्यों ना उसे ऐसे ही उसपे छोड़ दिया जाए। आख़िर किसी की ज़िम्मेदारी है इस कहानी को पुरा करना..!

जिसने शुरू की है…आगे का सीन भी वही डिसाइड़ करे…हम क्यों करे? हमारा काम तो बस किरदार निभाते रहना है ।”


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Saturday, October 1, 2022

कुछ ऐसे थे हमारे शास्त्री जी.......

 कुछ ऐसे थे हमारे शास्त्री जी...............


उत्तर भारत में, गंगा की गोद में पैदा हुए लाल बहादुर शास्त्री की। वह देश के दूसरे प्रधानमंत्री बने। संघर्षों की भट्ठी में तप कर सोना हुए, शास्त्रीजी का जन्म 2 अक्टूबर, 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में हुआ। पिता एक स्कूल शिक्षक थे. पर, शास्त्रीजी केवल डेढ़ वर्ष के थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया. मां ने तीनों बच्चों को पाला-पोसा. शास्त्रीजी कुशाग्र थे। पढ़ाई के प्रति ललक ऐसी कि जेठ की झुलसाती गर्मी में भी कई मील की दूरी नंगे पांव से ही तय कर स्कूल जाते थे। आर्थिक कठिनाइयों से जूझकर उन्होंने अपनी पढाई पूरी की. भादो की बाढ़ में उफनती गंगा को पार कर कॉलेज जाने के कई प्रसंग लोक मानस में मशहूर हैं। शास्त्रीजी की महज सोलह वर्ष की आयु थी जब वह, गांधीजी के आह्वान पर अपनी पढ़ाई छोड़ असहयोग आंदोलन में शामिल हुए। देश गुलामी की जंजीरों से निकले इसके लिए. उन्होंने अंगरेजी शासन के खिलाफ कई विद्रोही अभियानों का नेतृत्व किया। करीब सात वर्षों तक विभिन्न जेलों में बंदी रहे. 1946 में जब अंतरिम सरकार का गठन हुआ, तो उन्हें उत्तर प्रदेश का संसदीय सचिव नियुक्त किया गया। जल्द ही वे गृह मंत्री के पद पर भी आसीन हुए. उनकी कर्मठता और दूरदर्शी नीतियों की चर्चा दिल्ली तक पहुंची. उन्हें 1951 में दिल्ली बुलाया गया. देश के विकास में योगदान देने के लिए बड़ी भूमिका निभाने के लिए वे दिल्ली आये, केंद्रीय मंत्रिमंडल के कई विभागों का प्रभार संभाला – रेल मंत्री बने, परिवहन एवं संचार मंत्री; वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री; गृह मंत्री। हर मंत्रालय में अपनी छाप छोड़ी. बुनियादी ढ़ांचे को मजबूत किया। 


वह जब रेल मंत्री थे तो, एक रेल दुर्घटना हुई. कई लोग मारे गए थे. शास्त्रीजी ने इस दुर्घटना के लिए खुद को नैतिक रूप से जिम्मेदार माना. रेलमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया. देश की सियासत में ऐसा पहली बार हुआ. संसद में उनकी सरहना हुई. तो तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने संसद में कहा कि ‘उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री का इस्तीफा इसलिए नहीं स्वीकार किया है कि जो कुछ हुआ वे इसके लिए जिम्मेदार हैं बल्कि इसलिए स्वीकार किया है क्योंकि इससे संवैधानिक मर्यादा में एक मिसाल कायम होगी.’ रेल दुर्घटना पर संसद में लंबी बहस चली. शास्त्रीजी का जवाब देते हुए कहा; ‘शायद मेरे लंबाई में छोटे होने एवं नम्र होने के कारण लोगों को लगता है कि मैं बहुत दृढ नहीं हो पा रहा हूं. यद्यपि शारीरिक रूप से में मैं मजबूत नहीं हूं लेकिन मुझे लगता है कि मैं आंतरिक रूप से इतना कमजोर भी नहीं हूं.’ बाद के दिनों तो शास्त्रीजी ने अद्भुत सांगठनिक क्षमता का परिचय दिया.!


एक प्रसंग यह है कि शास्त्री जी ने मां को नहीं बताया था कि वो देश के रेल मंत्री हैं..!

कहा था कि "मैं रेलवे में नौकरी करता हूं"।

वह एक बार किसी रेलवे के कार्यक्रम में आए थे जब उनकी मां भी वहां पूछते-पूछते पहुंची कि मेरा बेटा भी आया है,वह भी रेलवे में है।

लोगों ने पूछा क्या नाम है जब उन्होंने नाम बताया लाल बहादुर शास्त्री तो सब चौंक गए " बोले यह झूठ बोल रही है"!

पर वह बोली, "नहीं वह आए हैं"।।

लोगों ने उन्हें लाल बहादुर शास्त्री जी के सामने ले जाकर पूछा," क्या वही है?"

तो मां बोली "हां वह मेरा बेटा है"

लोग मंत्री जी से दिखा कर बोले "क्या वह आपकी मां है"

तब शास्त्री जी ने अपनी मां को बुला कर अपने पास बिठाया और कुछ देर बाद घर भेज दिया।।

तो पत्रकारों ने उनसे पूछा "आपने मां के सामने भाषण क्यों नहीं दिया"..?

तो वह बोले--- मेरी मां को यह नहीं पता कि मैं रेलमंत्री हूं।। अगर उन्हें पता चल जाएगा तो वह लोगों की सिफारिश करने लगेगी और मैं कभी मना भी नहीं कर पाऊंगा।..... और उन्हें अहंकार भी हो जाएगा..! जवाब सुनकर सब सन्न रह गए..!!

आज कहां गए लोगों की निःस्वार्थ भाव से सेवा करने वाले,सच्चे और ईमानदार लोग..! 


पंडित नेहरु के निधन के बाद वह जब प्रधानमंत्री बने, तो उन्हें कांटों भरा ताज मिला देश, सरहद से लेकर, खेतों तक संकट से जूझ रहा था, देश में भुखमरी के हालात थे। शास्त्रीजी ने कहा कि देश का हर नागरिक एक दिन का व्रत करे, तो भुखमरी खत्म हो जाएगी। खुद शास्त्रीजी नियमित व्रत रखा करते थे और परिवार को भी यही आदेश था, प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने गांधीवादी तरीके से विकास के रास्ते की तलाश की गांव-गांव जाना लोगों से मिलना किसानों की बात करना सुनील शास्त्री की किताब 'लाल बहादुर शास्त्री, मेरे बाबूजी' में शास्त्रीजी के जीवन से जुड़े कई आत्मीय प्रसंग हैं उन्होंने अपनी किताब में लिखा है कि उनके पिता सरकारी खर्चे पर मिली कार का प्रयोग नहीं करते थे। एक बार उन्होंने (सुनील शास्त्री ने) अपने पिता की कार चला ली, तो शास्त्रीजी ने किलोमीटर का हिसाब कर पैसा सरकारी खाते में जमा कराया. उनका पूरा जीवन ऐसे प्रेरक प्रसंगों से भरा रहा है उनकी ईमानदारी, उनकी शुचिता के कई प्रसंग मिलते हैं।

 

वह जब देश के प्रधानमंत्री बने, तो उनके पास खुद का कोई घर नहीं था और ना ही खुद की एक कार. एक प्रसंग है- शास्त्रीजी ने जब कार खरीदने के लिए सोचा, तो उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं थे. खाते में सिर्फ 7 हजार रुपए थे, जबकि कार की कीमत 12000 रुपए थी. ऐसे में उन्होंने बैंक से 5 हजार रुपए का लोन लिया. पर, लोन लेने के एक साल बाद ही उनका निधन हो गया। इंदिराजी ने उनके लोन को माफ करने की पेशकश की.  पर, शास्त्रीजी की पत्नी ललिताजी ने उनकी बात को सहजता से नकारते हुए कहा कि किस्तें वह ही भरेंगी। शास्त्रीजी के निधन के चार साल बाद तक ललिताजी ने कार की ईएमआई भरी. लोन चुकता किया शास्त्रीजी की वह कार आज भी दिल्ली के लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल में रखी हुई है। 


आज सोचता हूं तो लगता है कि आखिर किस मिट्टी के बने थे, कैसा उद्दात्त चरित्र था कैसे लोग थे। सत्ता के अहम पद पर रहते हुए भी जीवन अत्यंत सादगी, विनम्रता और मूल्यों के साथ जीना!


शास्त्रीजी जैसे लोग उसी संस्कृति को बढ़ानेवाले, विलक्षण लोगों में से हुए, उन्होंने रास्ता चुना, बिल्कुल ऋषियों की तरह, संघर्ष का, निर्माण का देश में लोकतांत्रिक मूल्यों को व्यवस्थित करने, संविधान को प्रतिष्ठित करने और क्रियान्वित करने का. आदर्श मूल्यों को स्थापित करने का.!


आज क्षेत्रीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर जो लोग लोहिया की बात करते रहे, उन्होंने खुले रूप से अपने परिवार को प्रश्रय दिया. जिन्होंने लोहिया की बात नहीं की, जो नयी चेतना की राजनीति करने दक्षिण में आयें, उनलोगों के परिवार के डेढ़-दो सौ की संख्या में रिश्तेदार राजनीति में छा गए।


शास्त्रीजी, जैसे राजनेता मूल्यों की राजनीति, चरित्र की राजनीति और भारत की जो श्रेष्ठ परंपरायें रही हैं उनके पुंज हैं। ये ऐसे लोग हैं जिन्होंने न परिवार को बढ़ावा दिया, न कभी धन- संपत्ति एकत्र की ये दोनों मानक हैं। तो कम से कम आज के दिन राजनीति करनेवाले हर आदमी को चाहें वह किसी दल का हो, किसी विचारधारा का हो, इनसे ऊर्जा-प्रेरणा लेनी चाहिए.!

Saturday, August 20, 2022

उत्तर प्रदेश भाजपा के संकटमोचन!

 2014 से 2022 तक उत्तर प्रदेश बीजेपी के संकटमोचन श्री Sunil Bansal जी..!


उत्तर प्रदेश के कुशल नेतृत्व संगठनात्मक कार्यशैली के अद्भुत व्यक्तित्व, सरल, कर्मठ,विन्रम,मृदुभाषी संगठन महामंत्री रहे बंसल जी को भारतीय जनता पार्टी ने अब राष्ट्रीय महामंत्री बनाया है। इसके साथ ही उन्हें तीन अहम राज्य पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और उड़ीसा का प्रभारी भी नियुक्त किया है। लोकसभा चुनाव से पहले ये बदलाव बीजेपी के लिए अहम माना जा रहा हैं साथ ही यह सुनील बंसल के लिए बड़ी जिम्मेदारी है और उनका कद भी बीजेपी में बढ़ा है। 


बंसल जी के बारे में कहा जाता है कि पार्टी में और संगठन में बहुत ही मजबूती से कार्य करते हैं। एक वाक्या है कि जब 2022 के उत्तर प्रदेश के चुनाव से ठीक पहले जो बीजेपी के मंत्री रहें स्वामी प्रसाद मौर्य और दारा सिंह चौहान जब बीजेपी छोड़कर समाजवादी पार्टी में चले गए तो बस ये यही दो लोग गए न कि कोई जिला इकाई का एक भी सदस्य। मंडल से लेकर जिला तक एक भी कार्यकर्ता नहीं गया, इस बात से आप साफ अंदाज़ लगा सकते हैं बंसल जी का संगठनात्मक कार्य कुशलता कितना अद्भुत और निपुण है। जब ये 2014 में उत्तर प्रदेश के बीजेपी के संगठन महामंत्री बने थे तो उससे पहले पार्टी में टूट थी, गुटबाजी थी , टिकट के लिए मारामारी थी, अपने ही पार्टी के नेताओं के पुतले उनके ही कार्यकर्ताओं द्वारा हमेशा फूंके जाते थे लेकिन इनके आने के बाद यह सब बिल्कुल बंद हो गया। इन्होंने सभी कार्यकर्ताओं को एकजुट किया सभी का आदर किया, सभी को कामों में झोंक दिया, सभी के साथ सौम्यता दिखाई, सभी को उसका हक दिलवाया और उत्तर प्रदेश के असंख्य कार्यकर्ताओं को जो इज्ज़त सम्मान दिलवाने में अपनी जी जान लगाया है उसे प्रदेश के कार्यकर्ता उन्हें पूरी ज़िंदगी याद रखेंगे। संगठन महामंत्री रहते हुए उत्तर प्रदेश में भाजपा की 2 बार सरकार बनवाने में बंसल जी की बहुत ही अहम भूमिका मानी जाती है। 


बंसल जी को जिन तीन राज्यों को प्रभारी बनाया गया है वे राज्य बीजेपी के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव के लिहाज से काफी अहम साबित होने वाला हैं। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद से बीजेपी ने कई झटके झेले हैं। वहां पार्टी के भीतर सबकुछ ठीक करने की कई कोशिश हुई लेकिन सफलता नहीं मिली। हालांकि पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में 42 में से 18 सीटें जीती थी।


अब बीजेपी के सामने पिछले बार के प्रदर्शन को बरकरार रखना या उससे बेहतर परफॉर्म करने की चुनौती है। उड़ीसा में बीजेपी को पिछले लोकसभा चुनाव में 21 में से 8 सीटें मिली थी बीजेपी यहां विकल्प बनने की कोशिश में हैं साथ ही सीटों की संख्या बढ़ाने की कोशिश में भी। तेलंगाना बीजेपी के मिशन साउथ के लिए काफी अहम है। बीजेपी दक्षिण भारत में अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर रही है और बीजेपी को तेलंगाना से काफी उम्मीदें हैं और यहां पार्टी सबसे ज्यादा फोकस कर रही है। अगले साल तेलंगाना में विधानसभा चुनाव हैं। यहां लोकसभा की 17 सीटे हैं जिनमें से बीजेपी ने 2019 में चार सीटें ही जीती थी। अब आने वाले समय में यह देखना है कि बंसल जी कैसे इन सभी जगहों पर उत्तर प्रदेश जैसा अपना लोहा मनवाते है। 


#sunilbansal #BJP #2024Election #BJPGeneralSecretary #UttarPradesh #BJP4IND

Wednesday, June 22, 2022

Respect Women.!

 That’s powerful...!


Every woman has a past. Some were physically abused. Some had violent parents. Some had pubertal issues. Some had sexual abuse as a child from their own family members. Some had messed up love stories. Some had been forced into sex in the name of love. Some had been drugged. Some were date raped. Some had been viciously photographed on bed. Some had been blackmailed by their ex-boyfriend. Some were in an abusive relationship. Some had menstrual problems. Some had a broken family. Some had a divorce. Some had an obesity issue. Some had financial droughts. Some had drug or alcohol addiction. Some had a few unsuccessful suicide attempts.


If you see a woman, who went through any of these but had already wiped her tears,tied her hair up, masked her sorrows with a divine smile, stood tall and strong, started walking towards her future because she still has some hope left inside her and has not given up on the concept of love that still exists in this world, do not stab her with her past. Do not confront her. Do not slap her with more abuse. Give way for her and walk beside her. May be hold her hands and walk for a while. You'll know how sweet that soul is and how strong her hopes are! You'll be amazed at how she carries herself after all her energy has been sucked out.


She need not always be only the woman next door or from a different home. She could be your own friend, your own sister, your own girlfriend, your own wife, even may be your own mother. 

Do not judge her by her past. Gift her the peaceful future that she deserves. Hold her hands against the world, which knows only to judge. Give her the love that she always yearned for. 

Saturday, May 28, 2022

भ्रष्टाचार के जड़ अधिकारीगण

 बेशक़ आप अपने जनप्रतिनिधियों से सवाल कीजिए,हर मुद्दे पर लड़िए,इसमें कोई शक नहीं है कि ये भी हर चीज़ के भ्रष्टाचार में लिप्त होते हैं...! 


लेकिन जब आम जनता सरकारी महकमों में बैठे कर्मचारियों से लेकर बड़े-बड़े अधिकारियों के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करने लगेंगे तो यकीन मानिए की हर चीजें बदलनी शुरू हो जायेगी...! क्योंकि सारे योजनाओं में अपनी कमीशन को बांट कर खाना योजना को सफल नहीं बनाना साफ साफ बात है की सारे भ्रष्टाचार के जड़ यही सब अधिकारी लोग होते हैं...!

Sunday, May 8, 2022

IAS-IPS धरती के भगवान.!

 आईएएस - आईपीएस धरती के भगवान


पूजा सिंघल के बहाने...


आईएएस - आईपीएस धरती के भगवान हैं... आपके पास जादुई छड़ी होती है। आपके लिए सब कुछ संभव है। आपके एक कॉल पर जिला हिलता है । आपकी सलाह से सरकारें चलती हैं। सचमुच आप भगवान हैं...


भगवान जी आप किस्मत और कर्म के धनी हैं। सिर्फ एक परीक्षा पास करते हैं और समाज के सबसे बड़े बुद्धिमान समझे जाते हैं। आप की हनक और ठसक से हर कोई वाकिफ है। नाम सिविल सर्वेंट है, लेकिन  ठसक सामंत वाली रखते हैं।  मॉडर्न जमाने के राजा तो आप ही लोग हैं। 


अगर आप आईएएस -आईपीएस हैं, तो आप भगवान हैं... आपके पिताजी भी वीसी बन सकते हैं। रिटायरमेंट के बाद आयोग के सदस्य बन सकते हैं। आपकी पत्नी संस्थान का डायरेक्टर बन सकती है। आप सबसे बड़ा कैंसर अस्पताल खोल सकते हैं। आप 10 बीघा में मछली पालन कर सकते हैं। आप बड़े निजी स्कूलों की लाइन लगा सकते हैं। आपका भाई नेशनल चैनल का पत्रकार बन सकता है। आप चैनल के पत्रकारों को मैगजीन के नाम पर 5-5 करोड़ का विज्ञापन देकर  भैया बन सकते हैं। 

आपके बेटे मोइनुल हक स्टेडियम में नहीं, अमेरिका के न्यूयॉर्क में टेनिस की ट्रेनिंग ले सकते हैं। आपके बेटे पटना के सरकारी स्कूल में नहीं रजवाड़ों के सिंधिया स्कूल में पढ़ सकते हैं। 

आप चाहे तो नौकरी छोड़कर मंदिर मस्जिद के सेक्रेटरी -डायरेक्टर बन सकते हैं । रिटायरमेंट के बाद भी आप किसी संस्थान के महानिदेशक बन सकते हैं। आपके नाक के नीचे करोड़ों रुपए का घोटाला होगा, लेकिन लालू यादव की तरह आप जेल नहीं  जा सकते।  रिटायरमेंट के बाद आप खुद वीसी बन सकते हैं। आपके जैसे बाल बुतरू को पढ़ाने वाले प्रकांड प्रोफेसर साहब लोग भले ही वीसी न बने,  लेकिन आप चुटकी बजाकर वीसी बन सकते हैं। 

 रिटायरमेंट के बाद आप ब्लैक मनी को ह्वाइट मनी करने के लिए बाबा बन सकते हैं। रिटायरमेंट के बाद आप गांधीजी की धरोहर का सीईओ बन सकते है। आप पर भले ही सूचना छिपाने का आरोप लगता है,  लेकिन रिटायरमेंट के बाद आप सूचना आयुक्त बन सकते हैं । जीवन भर अधिकारों का हनन करने के बावजूद,  आप मानवाधिकार का  सदस्य बन सकते हैं । आपकी पत्नी बड़का साहित्यकार बन सकती हैं और धड़ल्ले से किताबें छप सकती हैं।


सचमुच, अगर आप आईएएस- आईपीएस हैं , तो भगवान हैं...आपका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता है। आप अखबारों में आराम से छपवा सकते हैं कि कैश सिर्फ 24000 है और मारुति -800 कार पर चलते हैं। पत्रकारों की इतनी हिम्मत कहां कि आपसे पूछे कि महाराज, दिल्ली वाला तीनों फ्लैटवा किसके नाम से है। अयोध्या और नोएडा वाला प्लॉट किसके नाम से है। धरती के भगवान आपसे कोई पूछ ही नहीं सकता कि कौन सी फैक्ट्री में नोट छापे की चार -चार गो फ्लैट हो गया। आपका वेतन प्रोफेसर के बराबर ही होता है लेकिन प्रोफेसर साहब प्रोफ़ेसर ही रह जाते हैं और आपके पास अथाह संपत्ति... 

भगवान आपकी संपत्ति की जांच कोई कर ही नहीं सकता। किसकी हिम्मत है?  नेता की? कभी नहीं। आप दोनों का रिश्ता इतना मजबूत होता है कि कोई कुछ कर ही नहीं पायेगा आप दोनों में दामाद- ससुर का भी रिश्ता होता है। अब भला ससुर अपने दामाद की जांच कैसे करा सकते हैं।

 आपकी महिमा अपरंपार है।  एक क्लर्क बेचारा ट्रांसफर के लिए 10 साल से तड़पते रहता है और आप तो दूसरे स्टेट से नौकरी करके भी आ सकते हैं । आपकी गोटी आपके पुरखों ने बहुत बढ़िया से सेट किया है भगवान। 


सचमुच, अगर आप आईएएस- आईपीएस हैं , तो भगवान हैं।  आपके लिए सब कुछ संभव है.... आपके नाम के साथ सिविल सर्वेंट जुड़ा हुआ है लेकिन आप सर्वेंट थोड़े हैं। आप तो मालिक हैं। हाकिम हैं। संविधान ने आपको सर्वेंट बनाया लेकिन आप तो हाकिम बन कर और तन कर  बैठे रहते हैं । आप मालिक के रूप में दिखते हैं और जनता सर्वेंट के रूप में दिखती है। जनता में इतनी हिम्मत कहां है कि आपको सर्वेंट बोले। जनता तो बेचारी है।  फिर भी आपको शर्माने  की जरूरत नहीं है, क्योंकि आप धरती के भगवान हैं। 

सचमुच, अगर आप आईएएस- आईपीएस हैं , तो भगवान हैं।  आपके लिए सब कुछ संभव है....

भगवान आप दारोगा को भी फोन करते हैं, तो बाबू कह कर बात करते हैं, क्योंकि थाना तो आप  5-5 लाख में बेचते हैं। आप बालू माफियाओं के साथ बालू -बालू खेल सकते हैं। आप प्रेमिकाओं की लाइन लगा सकते हैं।  रेप तक कर सकते हैं । कोई  कुछ साबित नहीं कर सकता।   आपकी दोस्ती और रिश्तेदारी के आगे पूरी दुनिया नतमस्तक है। आप की कलाबाजी के आगे भी पूरी दुनिया नतमस्तक है। अखबारों में धड़ल्ले से छपता है- 4 करोड़ का फ्लैट 14 करोड़ की संपत्ति... लेकिन कोई यह नहीं पूछ सकता कि इतनी संपत्ति आयी कहां से ?  क्या किसी प्रोफेसर के पास नौकरी में आने के बाद इतनी संपत्ति होती है  महाराज!  वेतन तो आप दोनों का बराबर  होता है न...


भगवान आपने एक प्रतियोगिता परीक्षा पास की,  दुनिया की सारी परीक्षाएं पास नहीं की। लेकिन आप खुद को सर्वज्ञाता समझते हैं। आप बहुत ब्रिलियंट रहते, तो कोई आविष्कार करते।  नया प्रयोग करते। सामाजिक बदलाव लाते। लेकिन आप में नैतिक बल है कहाँ? सरकार कह रही है कि दहेज बंद करो और आप खुद दो करोड़ दहेज लेकर शादी किए हैं । सरकार कहती है कि शिक्षा में सुधार लाएंगे और आपका बेटा  कान्वेंट में पढ़ता है। सरकार कहती है कि बेरोजगारी दूर करेंगे और आपकी एजेंसी सरकारी ऑफिसों में संविदा कर्मियों को रखवाती है। 

हे भगवान!  हे आर्यपुत्र ! क्या आपको शर्म नहीं आती। सारा भ्रष्टाचार आप से ही शुरू होता है। आप अगर ठीक हो जाएं,  तो नीचे का सिस्टम दुरुस्त हो जाए। लेकिन आपको तो पूजा सिंघल बनने में मजा आता है....

Tuesday, March 29, 2022

सच में निराले थे "सूर्यकांत त्रिपाठी निराला"

 सच में निराले थे "सूर्यकांत त्रिपाठी निराला"


एक बार देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू जी इलाहाबाद आए हुए थे। इलाहाबाद के दारागंज में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के घर पर स्वागत समारोह एवं चाय नाश्ता का प्रबंध किया गया था। जब निराला को पंडित नेहरू के आने की सूचना मिली, तब वे चाय पीने जा रहे थे। उनके हाथ में चाय का कुल्हड़ था, वे कुल्हड़ को हाथ में लिए हुए ही चल पड़े, स्वागत समारोह स्थल उन महाशय की कोठी की ओर नेहरू से मिलने वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों ने महाकवि को नहीं पहचाना इसलिए वे उन्हें अंदर नहीं जाने दे रहे थे। 


बस फिर क्या था निराला आग बबूला हो गए और बोले कि होंगे तो होंगे तुम्हारे प्रधानमंत्री, मेरे लिए तो वे आज भी जवाहरलाल नेहरू ही है। यह कहते हुए वे कोठी की सीढ़ी से नीचे उतर चुके थे, अंदर बैठे कुछ लोगों ने यह सारी बातें सुन ली थी, वे लोग दौड़े-दौड़े बाहर आए और निराला को मानते हुए बोले माफ़ी चाहते है हमलोग सुरक्षा व्यवस्था में लगे लोग आपको नहीं पहचान सकें, 'चलिए आप पंडित नेहरू जी से मिल लीजिए' पर कवि पर तो क्रोध सवार होता था तो फिर वे किसी के मानने से भला कब मानने वाले थे, और वे नेहरू से बिना मिले ही लौट आए। 

बाद में जब यह पूरी बात नेहरू को पता लगी तो जब वे अगली बार इलाहाबाद के दौरे पर आए तो उन्होंने ख़ुद अपने सेक्रेटरी को बोलकर निराला के पास कार भेजी और संदेश भिजवाया की प्रधानमंत्री आपसे मिलना चाहते हैं। मगर निराला जी ने उनसे मिलने से साफ मना कर दिया और कहा कि कह देना "अपने प्रिय प्रधानमंत्री से की महाकवि निराला प्रधानमंत्री से नहीं मिलना चाहता", और कार जैसे आई थी वैसे ही खाली ले जाओ। 

इतना ही नहीं एक जब हमारे देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद जी इलाहाबाद आए तो उन्होंने भी निराला से मिलने के लिए उनके पास कार भेजवाई थीं तो उस समय भी निराला ने राष्ट्रपति से मिलने से मना कर दिया था, तो कुछ ऐसा ही था महाप्राण निराला का स्वाभिमान..!

Saturday, March 26, 2022

राजनीति के चक्कर में आपसी संबंध बर्बाद न करें.!

राजनीति के चक्कर में आपसी संबंध बर्बाद न करे। अगर कोई आपका साथी आपसे अलग विचारधारा रखता तो इसका ये मतलब नही है की वो विद्रोही है। जब किसी को खून की जरूरत होती है तो शायद किसी पार्टी के नेता ख़ून देने जाता हो लेकिन आपका दोस्त जरूर जाएगा।जो की आपके लिए ख़ून क्या जान भी दे सकता है,उससे राजनीतिक बात पर ज्यादा बहस न करे। कही ऐसा न हो की आप तर्क तो जीत जाए और वो संबंध हार जाए।

Friday, March 11, 2022

धर्म सुदामा जैसे निःस्वार्थ तपस्वियों के त्याग की शक्ति से जीवन पाता है।

 कृष्ण सुदामा से बार-बार कहते रहे कि कुछ मांगो मित्र, पर सुदामा ने बड़ी शालीनता से उनके हर अनुरोध को ठुकरा दिया। तीन मुट्ठी तन्दुल ले कर गए दरिद्र सुदामा जब द्वारिकाधीश से बिना कुछ लिए लौट गए तो रुक्मिणी ने कहा, "प्रभु! ये तो सबकुछ ठुकरा कर चले गए। अब क्या होगा?"

    भगवान बोले, "जानती हो देवी! व्यक्ति यदि अपने अंदर के लोभ को मार दे तो वह ईश्वर से भी पराजित नहीं होता। सुदामा को इस संसार में किसी चीज का लोभ ही नहीं है, वह तो केवल अपनी पत्नी के कहने पर आ गया है। उसे न अपने मित्र कृष्ण से कुछ चाहिए, न भगवान कृष्ण से। मैं जानता था कि यह मुझसे कुछ नहीं लेगा।"

    "पर प्रभु! सुदामा जी के परिवार की दशा तो देख रहे हैं न आप? ये कुछ मांगे न मांगे, पर उनके दुख को दूर करना आपका कर्तव्य है।"

    कृष्ण मुस्कुराए। कहा, "तुम नहीं जानती इस सुदामा को! सारा संसार जिस कृष्ण को भगवान कहता है, विडम्बना देखो कि वह चाह कर भी इस विपन्न ब्राह्मण को कुछ दे नहीं पायेगा। इसके घर पहुँचने से पहले मैं इसकी झोपड़ी को महल बना कर उसे मोतियों से भर दूंगा, पर यह उसे भी क्रूरता पूर्वक ठुकरा देगा। यह मेरे द्वारा दिये गए धन को तिनके से भी नहीं छुएगा। तभी तो इस विशाल संसार मे कृष्ण को अपना मित्र बता सकने का अधिकार समय ने केवल इसे ही दिया है। इस समय संसार में केवल हमीं दो लोग हैं जिन्होंने किसी से कुछ नहीं लिया। कुछ भी नहीं।"

      यह कैसी बात हुई प्रभु? क्या सुदामा जी अपने परिवार की दरिद्रता दूर करने का प्रयत्न नहीं करेंगे?

      कृष्ण खिलखिला उठे। बोले, " इस कृष्ण को संसार मे सुदामा से अधिक कोई नहीं जानता देवी। वह जानता है कि द्वारिका पहुँच जाने से ही उसका कार्य सम्पन्न हो गया है, मैं अब उसके परिवार का हर दुख दूर कर दूंगा। बस वह अपने मुख से कुछ नहीं मांगेगा, न स्वयं मेरा सहयोग स्वीकार करेगा।

       रुक्मिणी कृष्ण को आश्चर्य से देखती रह गईं। कृष्ण बोले, "ऐसे भक्तों की भक्ति करने का मन होता है जो अपने आराध्य से भी कुछ न लेना चाहते हों। अपनी छोटी छोटी इच्छाओं के लिए ईश्वर को पुकारने वाले मनुष्य न धर्म के सगे होते हैं न सभ्यता के। धर्म सुदामा जैसे निःस्वार्थ तपस्वियों के त्याग की शक्ति से जीवन पाता है। यह तो इसका प्रेम था जो मुझतक पैदल चला आया, नहीं तो सुदामा जैसे त्यागी ब्राह्मण जब पुकार दें, ईश्वर स्वयं उनकी चौकठ तक पहुँच जाएंगे।

रुक्मिणी ने कृष्ण को प्रणाम कर के कहा, "धन्य हैं आप! जैसे आप, वैसे ही आपके मित्र..."



मोदी से बड़ा 'मोदी' होगा, योगी के बाद जो आएगा वह योगी से बड़ा 'योगी' होगा.!

 फणीश्वर नाथ रेणु के उपन्यास 'परती परिकथा' में एक पात्र है लुत्तो! वह उपन्यास के नायक जीतन से चिढ़ा रहता है, और हमेशा अपने मासूम(मूर्ख) समर्थकों की भीड़ लेकर जीतन को परेशान करने का प्रयास करता रहता है। एक बार जब वह हजारों की भीड़ को झूठा भय दिखा कर जीतन को मारने के लिए उकसा लाता है तो मन ही मन सोचता है- "यह भीड़ जल्दी से जल्दी जीतन को चीड़ फाड़ क्यों नहीं देती... जनता सब कुछ तहस नहस क्यों नहीं कर देती..."

    जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों को जल्दी से जल्दी उखाड़ कर फेंक देने की बेचैनी में मर रहे इन टुच्चे पत्रकारों को देख कर मुझे परती परिकथा का वह धूर्त लुत्तो याद आता है। ईसाई मिशनिरिओं की छोड़ी हड्डियों पर पलने वाले ये नीच यदि पा जाएं तो शायद दांत काट कर मार दें उनको...

    पिछले वर्ष भर से बंगाल में रोज ही राजनैतिक कार्यकर्ताओं की निर्मम हत्याएं हो रही हैं, केरल में भी ऐसी हत्याएं आम हैं। पर ईसाई मिशनरियों के हाथों अपनी आत्मा बेंच चुके इन धूर्त लेखकों/पत्रकारों के लिए वह टेरर नहीं है। लेकिन कभी दंगा प्रदेश बन चुके राज्य में पिछले पाँच वर्ष में कोई भी दंगा नहीं हुआ, फिर भी इन्हें यूपी में टेरर दिख रहा है।

    मेरे एक परिचित हैं। नीतीश कुमार के शासन के पहले उनके पिताजी मीरगंज स्टेशन पर पॉकेटमारी करते थे। वे आजकल योगी आदित्यनाथ को आतंकी बताते हैं। सुबह जगने से ले कर रात को सोने के समय तक वे पानी पी पी कर मोदी योगी को कोसते हैं।

        नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ ने अपने विरोधियों की जितनी घृणा झेली है, उतनी घृणा किसी राजनीतिज्ञ को नहीं मिली। सोच कर देखिये, क्या इस घृणा का कारण केवल सरकार की कमियां हैं? नहीं! कमियां तो हर सरकार में होती हैं, पर पहले ऐसी घृणा नहीं दिखी कभी। दरअसल इस घृणा का कारण है हिंदुत्व! इस घृणा का कारण है हिंदुत्व का पुनरूत्थान! ईसाई उत्कोच से पल रहे इन धूर्तों को हिन्दू और हिंदुत्व से इतनी पीड़ा है कि वे इसे रोकने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। मोदी योगी और अमित शाह के लिए दशक भर से किया जा रहा विषवमन इसी घृणा का नतीजा है।

      पर ये धूर्त नहीं जानते कि दानवी घृणा भी देवत्व को पुष्ट करती है। इन नीच प्रपंचियो की घृणा ही योगी आदित्यनाथ के लालकिला तक पहुँचने का मार्ग प्रसस्त करेगी। राजनीति में कुछ भी पाँच वर्ष के लिए नहीं होता...

      तुम्हारी पीड़ा कभी समाप्त नहीं होगी बिके हुए लोगों। मोदी के बाद जो आएगा वह मोदी से बड़ा 'मोदी' होगा, योगी के बाद जो आएगा वह योगी से बड़ा 'योगी' होगा। युग बदल गया है।



Sunday, February 27, 2022

कभी कभी सब कुछ नियति के हाथों सौंपकर अपने उत्तरदायित्व व प्राथमिकता पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए

 जंगल में एक गर्भवती हिरणी बच्चे को जन्म देने को थी इसलिए वो एकांत जगह की तलाश में इधर- उधर घुम रही थी,कि तभी उसे नदी किनारे ऊँची और घनी घास दिखी।। उसे वो उपयुक्त स्थान लगा शिशु को जन्म देने के लिए वहां पहुंचते ही उसे प्रसव पीड़ा शुरू हो गई..! उसी समय आसमान में घनघोर बादल वर्षा को गरजने लगा और जोरों की बिजली कड़कने लगी...!


उसने अपनी दाएं ओर देखा,तो एक शिकारी तीर का निशाना उस की तरफ साध रहा था,घबराकर वह दाहिने मुड़ी,तो वहां एक भूखा शेर झपटने को तैयार बैठा था,ठीक सामने सूखी घास आग में पकड़ चुकी थी और पीछे मुड़ी तो खाई थी।।


मादा हिरणी क्या करती? वह प्रसव पीड़ा से व्याकुल थी।। अब क्या होगा ? क्या हिरणी जीवित बचेगी ? क्या वो अपने शावक को जन्म दे पायेगी ? क्या शावक जीवित रहेगा ? 


क्या जंगल की आग सब कुछ जला देगी ? क्या मादा हिरणी शिकारी के तीर  से बच पायेगी ?क्या मादा हिरणी भूखे शेर का भोजन बनेगी ?

वो एक तरफ आग से घिरी है और पीछे खाई वाली नदी बह रही थी,तो अब क्या करेगी वो?


हिरणी ने अपने आप को शून्य में छोड़ कर अपने बच्चे को जन्म देने में लग गई,कुदरत का करिश्मा देखिए....बिजली चमकी और तीर छोडते हुए, शिकारी की आँखे चौंधिया गई उसका तीर हिरणी के पास से गुजरते,शेर की आँख में जा लगा,शेर कराहता हुआ इधर उधर भागने लगा,और शिकारी शेर को घायल ज़ानकर भाग गया.........घनघोर बारिश शुरू हो गयी और जंगल की आग बुझ गयी।। हिरणी ने शावक को जन्म दिया.....!


हमारे जीवन में भी कभी कभी कुछ क्षण ऐसे आते है,जब हम चारो तरफ से समस्याओं से घिरे होते हैं और कोई निर्णय नहीं ले पाते।। तब सब कुछ नियति के हाथों सौंपकर अपने उत्तरदायित्व व प्राथमिकता पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।।अन्तत:यश,अपयश,हार,जीत,जीवन,मृत्यु का अन्तिम निर्णय ईश्वर करता है।। हमें उस पर विश्वास कर उसके निर्णय का सम्मान करना चाहिए.....!

Sunday, February 20, 2022

"युवक " भगत सिंह

 ['युवक!’ शीर्षक से नीचे दिया गया भगत सिंह का यह लेख ‘साप्ताहिक मतवाला’ (वर्ष : 2, अंक सं. 36, 16 मई, 1925) में बलवन्तसिंह के नाम से छपा था। इस लेख की चर्चा ‘मतवाला’ के सम्पादकीय कर्म से जुड़े आचार्य शिवपूजन सहाय की डायरी में भी मिलती है। लेख से पूर्व यहाँ'आलोचना’ में प्रकाशित डायरी के उस अंश को भी उद्धृत किया जा रहा है।- स.]


सन्ध्या समय सम्मेलन भवन के रंगमंच पर देशभक्त की स्मृति में सभा हुई। ... भगतसिंह ने ‘मतवाला’ (कलकत्ता) में एक लेख लिखा था : जिसको सँवार-सुधार कर मैंने छापा था और उसे पुस्तक भण्डार द्वारा प्रकाशित ‘युवक साहित्य’ में संगृहीत भी मैंने ही किया था। वह लेख बलवन्तसिंह के नाम से लिखा था। क्रांतिकारी लेख प्राय: गुमनाम लिखते थे। यह रहस्य किसी को ज्ञात नहीं। वह लेख युवक-विषयक था। वह लाहौर से उन्होंने भेजा था। असली नाम की जगह ‘बलवंत सिंह’ ही छापने को लिखा था।


(आचार्य शिवपूजन सहाय की डायरी के अंश, 23 मार्च, पृष्ठ 28, आलोचना-67/वर्ष 32/अक्तूबर-दिसंबर, 1983)


युवावस्था मानव-जीवन का वसन्तकाल है। उसे पाकर मनुष्य मतवाला हो जाता है। हजारों बोतल का नशा छा जाता है। विधाता की दी हुई सारी शक्तियाँ सहस्र धारा होकर फूट पड़ती हैं। मदांध मातंग की तरह निरंकुश, वर्षाकालीन शोणभद्र की तरह दुर्द्धर्ष,प्रलयकालीन प्रबल प्रभंजन की तरह प्रचण्ड, नवागत वसन्त की प्रथम मल्लिका कलिका की तरह कोमल, ज्वालामुखी की तरह उच्छृंखल और भैरवी-संगीत की तरह मधुर युवावस्था है। उज्जवल प्रभात की शोभा, स्निग्ध सन्ध्या की छटा, शरच्चन्द्रिका की माधुरी ग्रीष्म-मध्याह्न का उत्ताप और भाद्रपदी अमावस्या के अर्द्धरात्र की भीषणता युवावस्था में निहित है। जैसे क्रांतिकारी की जेब में बमगोला, षड्यंत्री की असटी में भरा-भराया तमंचा, रण-रस-रसिक वीर के हाथ में खड्ग, वैसे ही मनुष्य की देह में युवावस्था। 16 से 25 वर्ष तक हाड़- चाम के सन्दूक में संसार-भर के हाहाकारों को समेटकर विधाता बन्द कर देता है। दस बरस तक यह झाँझरी नैया मँझधार तूफान में डगमगाती तहती है। युवावस्था देखने में तो शस्यश्यामला वसुन्धरा से भी सुन्दर है, पर इसके अन्दर भूकम्प की-सी भयंकरता भरी हुई है। इसीलिए युवावस्था में मनुष्य के लिए केवल दो ही मार्ग हैं- वह चढ़ सकता है उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर, वह गिर सकता है अध:पात के अंधेरे खन्दक में। चाहे तो त्यागी हो सकता है युवक, चाहे तो विलासी बन सकता है युवक। वह देवता बन सकता है, तो पिशाच भी बन सकता है। वही संसार को त्रस्त कर सकता है, वही संसार को अभयदान दे सकता है। संसार में युवक का ही साम्राज्य है। युवक के कीर्तिमान से संसार का इतिहास भरा पड़ा है। युवक ही रणचण्डी के ललाट की रेखा है। युवक स्वदेश की यश-दुन्दुभि का तुमुल निनाद है। युवक ही स्वदेश की विजय-वैजयंती का सुदृढ़ दण्ड है। वह महाभारत के भीष्मपर्व की पहली ललकार के समान विकराल है, प्रथम मिलन के स्फीत चुम्बन की तरह सरस है, रावण के अहंकार की तरह निर्भीक है, प्रह्लाद के सत्याग्रह की तरह दृढ़ और अटल है। अगर किसी विशाल हृदय की आवश्यकता हो, तो युवकों के हृदय टटोलो। अगर किसी आत्मत्यागी वीर की चाह हो, तो युवकों से माँगो। रसिकता उसी के बाँटे पड़ी है। भावुकता पर उसी का सिक्का है। वह छन्द शास्त्र से अनभिज्ञ होने पर भी प्रतिभाशाली कवि है। कवि भी उसी के हृदयारविन्द का मधुप है। वह रसों की परिभाषा नहीं जानता,पर वह कविता का सच्चा मर्मज्ञ है। सृष्टि की एक विषम समस्या है युवक। ईश्वरीय रचना-कौशल का एक उत्कृष्ट नमूना है युवक। सन्ध्या समय वह नदी के तट पर घण्टों बैठा रहता है। क्षितिज की ओर बढ़ते जानेवाले रक्त-रश्मि सूर्यदेव को आकृष्ट नेत्रों से देखता रह जाता है। उस पार से आती हुई संगीत-लहरी के मन्द प्रवाह में तल्लीन हो जाता है। विचित्र है उसका जीवन। अद्भुत है उसका साहस। अमोघ है उसका उत्साह।


वह निश्चिन्त है, असावधान है। लगन लग गयी है, तो रात-भर जागना उसके बाएं हाथ का खेल है, जेठ की दुपहरी चैत की चांदनी है, सावन-भादों की झड़ी मंगलोत्सव की पुष्पवृष्टि है, श्मशान की निस्तब्धता, उद्यान का विहंग-कल कूजन है। वह इच्छा करे तो समाज और जाति को उद्बुद्ध कर दे, देश की लाली रख ले, राष्ट्र का मुखोज्ज्वल कर दे, बड़े-बड़े साम्राज्य उलट डाले। पतितों के उत्थान और संसार के उद्धारक सूत्र उसी के हाथ में हैं। वह इस विशाल विश्व रंगस्थल का सिद्धहस्त खिलाड़ी है।


अगर रक्त की भेंट चाहिए, तो सिवा युवक के कौन देगा ?अगर तुम बलिदान चाहते हो, तो तुम्हें युवक की ओर देखना पड़ेगा। प्रत्येक जाति के भाग्यविधाता युवक ही तो होते हैं। एक पाश्चात्य पंडित ने ठीक ही कहा है- It is an established truism that youngmen of today are the countrymen of tomorrow holding in their hands the high destinies of the land. They are the seeds that spring and bear fruit. भावार्थ यह कि आज के युवक ही कल के देश के भाग्य-निर्माता हैं। वे ही भविष्य के सफलता के बीज हैं।


संसार के इतिहासों के पन्ने खोलकर देख लो, युवक के रक्त से लिखे हुए अमर सन्देश भरे पड़े हैं। संसार की क्रांतियों और परिवर्तनों के वर्णन छाँट डालो, उनमें केवल ऐसे युवक ही मिलेंगे,जिन्हें बुद्धिमानों ने ‘पागल छोकड़े’ अथवा ‘पथभ्रष्ट’ कहा है। पर जो सिड़ी हैं, वे क्या ख़ाक समझेंगे कि स्वदेशाभिमान से उन्मत्त होकर अपनी लोथों से किले की खाइयों को पाट देनेवाले जापानी युवक किस फौलाद के टुकड़े थे। सच्चा युवक तो बिना झिझक के मृत्यु का आलिंगन करता है, चौखी संगीनों के सामने छाती खोलकर डट जाता है, तोप के मुँह पर बैठकर भी मुस्कुराता ही रहता है, बेड़ियों की झनकार पर राष्ट्रीय गान गाता है और फाँसी के तख्ते पर अट्टहासपूर्वक आरूढ़ हो जाता है।फाँसी के दिन युवक का ही वजन बढ़ता है, जेल की चक्की पर युवक ही उद्बोधन मन्त्र गाता है,कालकोठरी के अन्धकार में धँसकर ही वह स्वदेश को अन्धकार के बीच से उबारता है।


 अमेरिका के युवक दल के नेता पैट्रिक हेनरी ने अपनी ओजस्विनी वक्तृता में एक बार कहा था- Life is a dearer outside the prisonwalls, but it is immeasurably dearer within the prison-cells, where it is the price paid for the freedom’s fight. अर्थात् जेल की दीवारों से बाहर की जिन्दगी बड़ी महँगी है,पर जेल की काल कोठरियो की जिन्दगी और भी महँगी है क्योंकि वहाँ यह स्वतन्त्रता-संग्राम के मूल्य रूप में चुकाई जाती है।


जब ऐसा सजीव नेता है, तभी तो अमेरिका के युवकों में यह ज्वलन्त घोषणा करने का साहस भी है कि, “We believe that when a Government becomes a destructive of the natural right of man, it is the man’s duty to destroy that Government."अर्थात् अमेरिका के युवक विश्वास करते हैं कि जन्मसिद्ध अधिकारों को पद-दलित करने वाली सत्ता का विनाश करना मनुष्य का कर्तव्य है।


ऐ भारतीय युवक! तू क्यों गफलत की नींद में पड़ा बेखबर सो रहा है। उठ, आँखें खोल, देख, प्राची-दिशा का ललाट सिन्दूर-रंजित हो उठा। अब अधिक मत सो। सोना हो तो अनंत निद्रा की गोद में जाकर सो रह। कापुरुषता के क्रोड़ में क्यों सोता है? माया-मोह-ममता का त्याग कर गरज उठ-


“Farewell Farewell My true Love

The army is on move;

And if I stayed with you Love,

A coward I shall prove.”


तेरी माता, तेरी प्रात:स्मरणीया, तेरी परम वन्दनीया, तेरी जगदम्बा, तेरी अन्नपूर्णा, तेरी त्रिशूलधारिणी, तेरी सिंहवाहिनी, तेरी शस्यश्यामलांचला आज फूट-फूटकर रो रही है। क्या उसकी विकलता तुझे तनिक भी चंचल नहीं करती? धिक्कार है तेरी निर्जीवता पर! तेरे पितर भी नतमस्तक हैं इस नपुंसकत्व पर! यदि अब भी तेरे किसी अंग में कुछ हया बाकी हो, तो उठकर माता के दूध की लाज रख, उसके उद्धार का बीड़ा उठा, उसके आँसुओं की एक-एक बूँद की सौगन्ध ले, उसका बेड़ा पार कर और बोल मुक्त कण्ठ से- वंदेमातरम्।

Thursday, February 10, 2022

वस्त्रो को धार्मिक मुद्दा ना बनाकर तन ढकने की आवश्यकता बनाया जाए.!

 कभी आपके ज़ेहन में सवाल आया है कि इंसान कपड़े क्यों पहनता है? आख़िर इंसान भी दूसरे जानवरों की तरह एक प्राणी ही तो है. फिर जब बाक़ी जानवर कपड़े नहीं पहनते तो आख़िर इंसान ने ऐसा करना क्यों शुरू कर दिया? इसके कई जवाब हो सकते हैं लेकिन जो प्रमुख वैज्ञानिक कारण है वह है  सर्दी और गर्मी से बचने के लिए अन्य कारणों में खूबसूरत दिखना शामिल हो सकता है परंतु धीरे धीरे व्यक्ति के वस्त्र उसके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग माने जाने लगे जैसे पुरुषों के वस्त्र अलग और स्त्रियों के वस्त्र अलग। इससे वस्त्रों का लैंगिक निर्धारण होने लगा। ब्राह्मण को धोती में तो क्षत्रिय को पगड़ी में दिखाया जाने लगा इससे समाज में वस्त्रों का जातिगत बटवारा हुआ , तो वही दूसरी तरफ शादीशुदा स्त्रियां साड़ी में और कुवारी सलवार सूट में रहेगी यह अप्रत्यक्ष रूप से सामाजिक अवधारणा बनती गई अर्थात वस्त्रों से कालांतर में वैवाहिक स्थिति का भी निर्धारण होने लगा.! इतना ही नहीं वस्त्रों का निर्धारण मौसम के आधार पर भी होने लगा अगर सर्दी हैं तो स्वेटर का उपयोग किया जाएगा और यदि गर्मी है तो टीशर्ट से काम चल जाएगा। परंतु हमारे पूर्वजों ने कभी नहीं सोचा होगा कि जिन वस्तुओं को पर्यावरण और भौगोलिक कारणों से अपनाया गया वह कभी व्यक्ति की धार्मिक पहचान भी बन जाएंगे । हमे  यह समझने की आवश्यकता है कि यूरोपियन लोग कोट पहनते हैं क्योंकि वहां सर्दी अधिक होती है वहीं भारतीय लोग धोती और कुर्ता पहनते हैं क्योंकि कर्क रेखा के अधिक निकट होने से हमारे यहां गर्मी की अधिकता रहती हैं राजस्थानी लोगों ने तो इस गर्मी से बचने के लिए साफा पहनना शुरू कर दिया ताकि सिर को अत्यधिक गर्मी और लू से बचाया जा सके यह बात और है कि साफा आज शादियों का प्रतीक बनकर रह गया है! हमें यह भी याद रखना चाहिए कि किसी धर्म का कोई रंग नहीं है क्योंकि धर्म रंगों से उच्च और वह जीवन जीने का सलीका है मुसलमानों ने हरा रंग रेगिस्तान में हरियाली के अभाव में अपनाया तो हिंदुओं ने श्वेत वस्त्र गर्मी से बचने के लिए और रंगीन वस्त्र अत्यधिक मात्रा में उत्सवों त्योहारों एवं बाहरी हस्तक्षेप और सामंजस्य से अपनाया..! अगर बात करें हाल ही में मुस्लिम महिलाओं के हिजाब विवाद की तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि राजस्थान के रेगिस्तान की तरह मुस्लिम कौम भी अरब के रेगिस्तान से संबंध रखती है जहां पर चलने वाली रेतीली आंधियों से सिर और आंखों को बचाने के लिए केवल स्त्रियां ही नहीं पुरुष भी ऊपर से नीचे ढके हुए रहते हैं यह बात और है कि स्त्री और पुरुषों के लिए क्रमशः कृष्ण और श्वेत वस्त्र निर्धारित कर दिए गए या यूं कहें यह परंपरा बन गई । अब यह सोचने वाली बात है कि जिस प्रकार से घुंघट प्रथा हिंदू धर्म का मूल तत्व ना होकर एक सामाजिक परंपरा थी उसी प्रकार से हिजाब भी अरब की भौगोलिक आवश्यकताओं के हिसाब से सही थी परंतु अब जब भारतीय परिवेश में जिस प्रकार से घुंघट प्रथा के बिना काम चल सकता है उसी प्रकार से कम से कम सार्वजनिक और सरकारी स्थलों स्कूलों और कॉलेजों में यूनिफॉर्म ड्रेस कोड लागू रहना चाहिए चाहे वह किसी भी धर्म का व्यक्ति हो हां यदि कोई मुस्लिम महिला यह पहनना चाहे तो यह उसका व्यक्तिगत अधिकार होना चाहिए जो उसके घर तक उसी प्रकार से सीमित हो जिस प्रकार से घुंघट प्रथा सीमित है। सरकार और माननीय न्यायालय को भी इस प्रकार के मुद्दों का निपटारा उसी प्रकार से करना चाहिए जिस प्रकार से संविधान के आधार पर सबरीमाला मंदिर के प्रवेश का निर्णय लिया गया ताकि कानून और संविधान के समक्ष सभी सामान बने रहें जब हम एक पंथनिरपेक्ष देश की बात करते हैं और लोकतंत्र के हिमायती परिवेश का निर्माण करना चाहते हैं तो हमें भगवा अथवा किसी भी धार्मिक पहचान बन चुके रंगो वाले वस्त्रों को शिक्षा संस्थानों में प्रवेश से रोकना होगा क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया गया तो शिक्षा का मूल उद्देश्य गर्त में चला जाएगा और शिक्षा संस्थान केवल धार्मिक और राजनीतिक क्रीड़ा स्थली बन जाएंगे। जिससे अंततः इस देश में विद्वानों की जगह विक्षिप्त पैदा होंगे और हम केवल नालंदा और तक्षशिला की कहानियां सुनाते हुए दिखाई देंगे जिनका वास्तविक जगत से कोई लेना-देना नहीं होगा.! बेहतर होगा वस्त्रो को हिंदू मुसलमान का मुद्दा ना बनाकर तन ढकने की आवश्यकता बनाया जाए.!

Tuesday, February 8, 2022

जिस हाथ से सैकड़ों मीठे फल खाएं हो,उससे एक कड़वे फल की क्या शिकायत:-

कहते हैं कि किसी राज्य में एक फकीर रहा करता था। राजा का बहुत स्नेह था उसपर। इतना स्नेह कि राजा सोता भी तो फकीर उसी के कमरे में सोता था। उसे बिना खिलाए कुछ खाता नहीं था। हर संभव कोशिश करता था कि फकीर को अपना सर्वश्रेष्ठ दे।

एक दिन वे दोनो शिकार को गए और शिकार करते करते रास्ता भूल गए। काफी देर हो चली थी। दोनों भूखे थे। राजा को एक फल दिखा, उन्होंने फल को तोड़ा। बड़ी दुविधा थी। फल एक खाने वाले दो। लेकिन जैसा कि राजा को आदत थी..वो फकीर को बिना खिलाए कुछ खाता नहीं था। राजा ने फल के  6 टुकड़े किए।

पहला टुकड़ा फकीर को दिया। फकीर ने कहा "वाह ! क्या स्वादिष्ट फल है, एक और टुकड़ा हमें दीजिए !" राजा ने एक और टुकड़ा फकीर की ओर बढ़ाई। उसने पुनः फल की प्रसंशा की और एक और टुकड़ा मांगा। राजा फल के एक-एक टुकड़े देता गया। राजा सोचने लगा कि आज इस फकीर को क्या हो गया। इसे तनिक भी खयाल नहीं कि मैं भी उतना ही भूखा हूं। अब राजा के पास मात्र एक टुकड़ा बचा था। तभी फकीर ने गुहार लगाई "महाराज, बस एक फांक और दे दीजिए। राजा से रहा नहीं गया। उसने कहा कि अब तुम ज्यादती कर रहे हो। हम तुम्हें प्रेम करते हैं इसका कत्तई ये मतलब नहीं कि तुम इसका अनुचित लाभ लो। तभी फकीर ने उनके हाथ से वो टुकड़ा भी छीन लिया पर राजा ने जैसे तैसे उस टुकड़े के अपने मुंह में डाला। वो फल नहीं बल्कि कड़वा जहर की भांति था। राजा ने मुंह में डालने के तुरंत बाद उसे थूक दिया और फकीर से कहा कि क्या तुम्हें मालूम है कि ये कितना कड़वा है और तुमने मुझसे बिना इसकी शिकायत किए पांच टुकड़े खा गए।

फकीर ने कहा : "महाराज ! जिस हाथ से सैकड़ों मीठे फल खाए हों, उससे एक कड़वे फल की क्या शिकायत! मैंने तो पांच टुकड़े बस इस उम्मीद में खाए कि कहीं आप तक इसकी शिकायत न पहुंच जाए कि फल कड़वा था।"

जीवन में संतोष बहुत आवश्यक है। एक सकारात्मक जीवन वहीं जी सकता है, जिसे होने में विश्वास है। उसके पास जो है, उससे वो प्रसन्न है। किसी अज्ञात के लालसा में दुखित नहीं है। वर्तमान को पूरे लगन से जी रहा है। ऐसे लोग सौ मीठे फलों की कृतज्ञता के सामने भला एक कड़वे फल की शिकायत के बारे में कैसे सोच सकते हैं।