Thursday, January 5, 2023

"Dumraon Raj Pariwar"

Dumraon Raj was a medieval chieftaincy and later a zamindari estate in erstwhile Shahabad district of Bihar, now in Buxar district.


The founders of Dumraon Raj were Ujjainiya Rajputs who traced their origin to the Parmar rulers of Malwa who moved to Western Bihar in the 13th century. The founder of the family was Santana Shahi who settled here while returning from Gaya after offering pind daan.


In 1745 Raja Horil Singh shifted the headquarters of his capital from Naurattan Garh in Bhojpur to Dumraon.


The next great chief of the Dumraon family was Raja Bikramjit Singh, who was given the title of Raja by the emperor Shah Alam in 1771. He was succced by his son Maharaja Bahadur Jai Prakash Singh in 1816.


In 1881 Radha Prasad Singh succeeded to the gaddi of Dumraon Raj and the title of Maharaj Bahadur was conferred on him in 1882  in precedence of the zamindars of Bettiah, Hathuwa and Darbhanga.


He was the head of the Rajputs in Shahbad and did valuable service during the famine of 1873-74. He was subsequently made K.C.I.E ( Knight Commander of the Indian Empire). His only daughter was married to Maharaj Venkat Raman Singh of Rewa.


On the death of Maharaja Radha Prasad Singh in 1894, the Dumraon Raj was placed under the management of Court of Wards but soon Maharani Beni Prasad  Kuari, the widow of late Maharaja, took it back and managed the affairs of the Raj till her death in 1907.


Due to the absence of direct male descendant, the Raj was engaged in a prolonged litigations. In 1911, after obtaining a decree in his favour from Sub-judge's Court in Arrah, Sri Keshav Prasad Singh got the possession of the Dumraon Raj from the Court of Wards.


He was conferred with the title of Maharaja Bahadur and Knighthood. He was also a member of the Executive Council of the Governor of Bihar. Paigambar Baksh Khan, father of the Shehnai Maestro Bharat Ratna Bismillah Khan was the court musician in his court. Bismillah Khan was born in Dumraon in 1916 and spent his early childhood there before moving to Banaras.


After his death in 1933, he was succeeded by Maharaja Rama Ranvijay Prasad Singh, who was further succeeded by his son Maharaja Kamal Singh in 1949.


It was during the regime of Maharaja Kamal Singh that the Zamindari system was abolished by the Bihar Land Reforms Act, 1950 and the possession of the zamindari villages of Dumraon Raj were handed to the Bihar government in 1952. He was also an industrialist and had sponsored a lantern factory and a cold storage at Dumraon.


The last Maharaja of Dumraon Raj in Bihar.

Maharaja Kamal Singh Elected from 1952 to 1962, he was the youngest MP and the last surviving member of the first Lok Sabha. He was known for his welfare works and bond with Atal Bihari Vajpayee. 


Dumraon Raj had sponsored a number of religious and charitable institutions for maintaining beautiful temples, hospitals, schools and educational institutions at Dumraon, Bikramganj and Arrah.

Remnants of this Raj can be traced at various locations including Bihta, Jagdisgpur, Bhojpur, Buxar and Patna.


Source - Bihar District Gazetteers: Shahabad)


Thursday, December 8, 2022

प्रेम में भावुकता पन!

हम जीवन में बहुत कुछ सीखते हैं। इनमें एक ज़रुरी चीज़ है इमोशनल मैनेजमेंट। अक्सर मज़बूत और समझदार समझे जाने वाले लोग भी अतिभावुकता में अपना नुकसान कर बैठते हैं। भावुक होना अच्छा है, लेकिन ख़ुद को दुख पहुंचाना किसी सूरत अच्छा नहीं।


सबसे ज़्यादा सेल्फ-हार्मिंग होता है प्रेम में टूटना। प्रेम..जिसके लिए तमाम आदर्श स्थापित है। बड़ी सुंदर सुंदर बातें पढ़ी-सुनी हैं हमने। लेकिन असल में ‘प्रेम’ के नाम पर ही तमाम खेल भी होते हैं। खिलाड़ी का कुछ नहीं बिगड़ता, मगर जिसके साथ खेला गया है वो जाने कितनी देर तक फुटबॉल की तरह इधर-उधर लुढ़कता रह जाता है। अरसे तक तो अस्वीकार की स्थिति ही बनी रहती है, और फिर उसके बाद नैराश्य, अवसाद, उदासी, अविश्वास जैसे तमाम भाव उपजने लगते हैं। कई बार तो मेडीकल कंडीशन तक बन जाती है। इसीलिए हमें अपने भावपक्ष पर काम करना बहुत ज़रूरी है।


आज के समय जब तमाम रिश्तों की परिभाषाएं बदल रही हैं, प्रेम भी इससे अछूता नहीं। पहले तो वो ‘प्रेम’ है..ये तय करना मुश्किल। डेटिंग एप्स के बाज़ार सजने के बाद तो ये खेल और ज़ोर शोर से जारी है। इसीलिए कुछ बातों को समझना ज़रूरी है। इन नई ‘terminology’ को जानना चाहिए, ताकि कभी इससे गुज़रे तो पता हो कि हमारे साथ दरअस्ल हो क्या रहा है।  इमोशनल होना अच्छा है, लेकिन इस कारण बेवकूफ न बनें।


पवित्र, सच्चा, बिना शर्त, प्लेटोनिक प्रेम की अव्यावहारिकता से बाहर आकर इन स्थितियों को समझिए- 


Gaslighting -  ‘गैसलाइटिंग’ को वर्ड ऑफ द ईयर के रूप में चुना गया है। सरल शब्दों में इसका मतलब अपने फायदे के लिए दूसरे को भरमाना है। इसमें एक पक्ष दूसरे के साथ मनोवैज्ञानिक तौर पर खेलता है। किसी को इस तरह से भ्रमित कर दिया जाए कि पीड़ित शख्स अपने विचारों पर, अपनी काबिलियत पर शक़ करने लगे। ये किसी भी तरह के संबंधों में किया जा सकता है।


Pocket Relationship – इसमें ज्यादातर एक पक्ष (कभी कभी दोनों भी) अपने रिश्ते को छिपाकर रखना चाहते हैं। जैसे कपड़ों के पॉकेट चीजें छिपाई जाती है, उसी तरह। जब बात दोतरफ़ा हो तो ठीक है, लेकिन अगर एक पार्टनर ऐसा कर रहा है बिना किसी जायज़ वजह के, तो आप एक असुरक्षित रिश्ते में हैं।


Situationship - प्रॉपर रिलेशनशिप से कम लेकिन कैजुएल रिलेशनशिप से ज्यादा। एक या दोनों पार्टनर के मन में फीलिंग है, लेकिन वो इसे स्वीकारने को तैयार नहीं। आप न ऑफिशियली रिलेशनशिप में हैं, न ही ये दोस्ती भर है। अक्सर ऐसा एक पार्टनर के साथ होता है कि वो भावनाओं से भर जाता है लेकिन सामने वाले पर कोई असर नहीं। यहां दोनों के बीच रोमांस भी है, लेकिन इसे कमिट नहीं करना है। ये स्थिति तब खतरनाक है जब कोई एक पार्टनर इमोशनल हो और दूसरे को रत्ती भर फर्क न पड़े।


Breadcrumbing – किसी के द्वारा रोमांटिक या फ्लर्टिंग वाले संदेश-संकेत देना, लेकिन नॉन-कमिटेड होकर। कभी आपको लेकर वो एकदम से उत्साहित, प्रेमिल हो जाए और फिर कुछ ही समय बाद व्यवहार एकदम ठंडा पड़ जाए। आप कन्फ्यूज़ रहें कि आप दोनों के बीच आख़िर है क्या। यह इमोशनल हेल्थ को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है।


Love Bombing - लव बॉम्बिंग शुरू में अच्छी लग सकती है। इसमें एक पार्टनर दूसरे के लिए अत्यधिक केयरिंग और प्रेमिल हो जाता है। जैसे प्यार का बम फोड़ दिया हो। धीरे-धीरे उसे खुदपर निर्भर और बाध्य महसूस कराने लगता है। पहले आपको प्यार से लबरेज़ कर देता है और फिर कुछ समय बाद उसका व्यवहार बदल जाता है। आप जैसे मझधार में फंस जाते हैं।


Ghosting – अचानक ही, बिना किसी कारण के आपसे सारे संबंध संपर्क खत्म कर देना। हर जगह से गायब हो जाना। असल जीवन से लेकर मैसेज, कॉल और तमाम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से अचानक नदारद हो जाना। यहां आप ख़ुद से पूछते ही रह जाएंगे कि आख़िर हुआ क्या है, आपकी ग़लती क्या है। इन सवालों के जवाब कभी नहीं मिलेंगे।


PS : ऐसी तमाम और बातें हैं और ये किसी के साथ भी हो सकता है। इसमें कोई जेंडर निर्धारित नहीं। बस जो पक्ष सच्चा-सरल होगा, वो परेशान रहेगा। जो खेल रहा है, वो खेलकर निकल जाएगा। इसीलिए खुद को इमोशनल टॉर्चर से बचाइये और अपनी मेंटल हेल्थ पर ध्यान दीजिए। आप सबसे अहम हैं..ये याद रखिए।

Tuesday, November 15, 2022

हमारा काम तो बस किरदार निभाते रहना है!

 “चलता है…सब कुछ चलता है....एक वक़्त ऐसा आता है जब तुम कुछ नहीं करना चाहते....!


जब जैसे भी हालात हो, कोई कुछ भी कहे…कोई कुछ भी करे…तुम बस जो चल रहा है उसे वैसे ही चलने देना चाहते हो।

सब कुछ जैसे छोड़ देते हो। कभी ये सोचते हो कि मेरे कुछ कहने और करने से फ़र्क़ ही क्या पड़ेगा..!


You know you easily except everything..!

तुम्हारे ज़हन में ये आता है कि ठीक है ना कितना कर सकते हैं…कितना अपने हिसाब से आप कहानी में बदलाव ला सकते हैं।

अंत में जिसने लिखी है उसने सब अपने हिसाब से ही करना है तुम्हारे और मेरे सोचने से कुछ होने ही नहीं वाला..!

तो जब कल सुबह उठने के बाद होने क्या वाला है उसका अंदाज़ा ही नही है तो क्यों ना जो जैसे चल रहा है उसे वैसे ही चलने दिया जाए..!

इस बात की फ़िक्र करे बिना कि कितना हो पायेगा,क्या जैसा सोचा है वैसा हो पायेगा? बात वैसे बन पायेगी?

क्यों ना उसे ऐसे ही उसपे छोड़ दिया जाए। आख़िर किसी की ज़िम्मेदारी है इस कहानी को पुरा करना..!

जिसने शुरू की है…आगे का सीन भी वही डिसाइड़ करे…हम क्यों करे? हमारा काम तो बस किरदार निभाते रहना है ।”


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Saturday, October 1, 2022

कुछ ऐसे थे हमारे शास्त्री जी.......

 कुछ ऐसे थे हमारे शास्त्री जी...............


उत्तर भारत में, गंगा की गोद में पैदा हुए लाल बहादुर शास्त्री की। वह देश के दूसरे प्रधानमंत्री बने। संघर्षों की भट्ठी में तप कर सोना हुए, शास्त्रीजी का जन्म 2 अक्टूबर, 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में हुआ। पिता एक स्कूल शिक्षक थे. पर, शास्त्रीजी केवल डेढ़ वर्ष के थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया. मां ने तीनों बच्चों को पाला-पोसा. शास्त्रीजी कुशाग्र थे। पढ़ाई के प्रति ललक ऐसी कि जेठ की झुलसाती गर्मी में भी कई मील की दूरी नंगे पांव से ही तय कर स्कूल जाते थे। आर्थिक कठिनाइयों से जूझकर उन्होंने अपनी पढाई पूरी की. भादो की बाढ़ में उफनती गंगा को पार कर कॉलेज जाने के कई प्रसंग लोक मानस में मशहूर हैं। शास्त्रीजी की महज सोलह वर्ष की आयु थी जब वह, गांधीजी के आह्वान पर अपनी पढ़ाई छोड़ असहयोग आंदोलन में शामिल हुए। देश गुलामी की जंजीरों से निकले इसके लिए. उन्होंने अंगरेजी शासन के खिलाफ कई विद्रोही अभियानों का नेतृत्व किया। करीब सात वर्षों तक विभिन्न जेलों में बंदी रहे. 1946 में जब अंतरिम सरकार का गठन हुआ, तो उन्हें उत्तर प्रदेश का संसदीय सचिव नियुक्त किया गया। जल्द ही वे गृह मंत्री के पद पर भी आसीन हुए. उनकी कर्मठता और दूरदर्शी नीतियों की चर्चा दिल्ली तक पहुंची. उन्हें 1951 में दिल्ली बुलाया गया. देश के विकास में योगदान देने के लिए बड़ी भूमिका निभाने के लिए वे दिल्ली आये, केंद्रीय मंत्रिमंडल के कई विभागों का प्रभार संभाला – रेल मंत्री बने, परिवहन एवं संचार मंत्री; वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री; गृह मंत्री। हर मंत्रालय में अपनी छाप छोड़ी. बुनियादी ढ़ांचे को मजबूत किया। 


वह जब रेल मंत्री थे तो, एक रेल दुर्घटना हुई. कई लोग मारे गए थे. शास्त्रीजी ने इस दुर्घटना के लिए खुद को नैतिक रूप से जिम्मेदार माना. रेलमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया. देश की सियासत में ऐसा पहली बार हुआ. संसद में उनकी सरहना हुई. तो तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने संसद में कहा कि ‘उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री का इस्तीफा इसलिए नहीं स्वीकार किया है कि जो कुछ हुआ वे इसके लिए जिम्मेदार हैं बल्कि इसलिए स्वीकार किया है क्योंकि इससे संवैधानिक मर्यादा में एक मिसाल कायम होगी.’ रेल दुर्घटना पर संसद में लंबी बहस चली. शास्त्रीजी का जवाब देते हुए कहा; ‘शायद मेरे लंबाई में छोटे होने एवं नम्र होने के कारण लोगों को लगता है कि मैं बहुत दृढ नहीं हो पा रहा हूं. यद्यपि शारीरिक रूप से में मैं मजबूत नहीं हूं लेकिन मुझे लगता है कि मैं आंतरिक रूप से इतना कमजोर भी नहीं हूं.’ बाद के दिनों तो शास्त्रीजी ने अद्भुत सांगठनिक क्षमता का परिचय दिया.!


एक प्रसंग यह है कि शास्त्री जी ने मां को नहीं बताया था कि वो देश के रेल मंत्री हैं..!

कहा था कि "मैं रेलवे में नौकरी करता हूं"।

वह एक बार किसी रेलवे के कार्यक्रम में आए थे जब उनकी मां भी वहां पूछते-पूछते पहुंची कि मेरा बेटा भी आया है,वह भी रेलवे में है।

लोगों ने पूछा क्या नाम है जब उन्होंने नाम बताया लाल बहादुर शास्त्री तो सब चौंक गए " बोले यह झूठ बोल रही है"!

पर वह बोली, "नहीं वह आए हैं"।।

लोगों ने उन्हें लाल बहादुर शास्त्री जी के सामने ले जाकर पूछा," क्या वही है?"

तो मां बोली "हां वह मेरा बेटा है"

लोग मंत्री जी से दिखा कर बोले "क्या वह आपकी मां है"

तब शास्त्री जी ने अपनी मां को बुला कर अपने पास बिठाया और कुछ देर बाद घर भेज दिया।।

तो पत्रकारों ने उनसे पूछा "आपने मां के सामने भाषण क्यों नहीं दिया"..?

तो वह बोले--- मेरी मां को यह नहीं पता कि मैं रेलमंत्री हूं।। अगर उन्हें पता चल जाएगा तो वह लोगों की सिफारिश करने लगेगी और मैं कभी मना भी नहीं कर पाऊंगा।..... और उन्हें अहंकार भी हो जाएगा..! जवाब सुनकर सब सन्न रह गए..!!

आज कहां गए लोगों की निःस्वार्थ भाव से सेवा करने वाले,सच्चे और ईमानदार लोग..! 


पंडित नेहरु के निधन के बाद वह जब प्रधानमंत्री बने, तो उन्हें कांटों भरा ताज मिला देश, सरहद से लेकर, खेतों तक संकट से जूझ रहा था, देश में भुखमरी के हालात थे। शास्त्रीजी ने कहा कि देश का हर नागरिक एक दिन का व्रत करे, तो भुखमरी खत्म हो जाएगी। खुद शास्त्रीजी नियमित व्रत रखा करते थे और परिवार को भी यही आदेश था, प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने गांधीवादी तरीके से विकास के रास्ते की तलाश की गांव-गांव जाना लोगों से मिलना किसानों की बात करना सुनील शास्त्री की किताब 'लाल बहादुर शास्त्री, मेरे बाबूजी' में शास्त्रीजी के जीवन से जुड़े कई आत्मीय प्रसंग हैं उन्होंने अपनी किताब में लिखा है कि उनके पिता सरकारी खर्चे पर मिली कार का प्रयोग नहीं करते थे। एक बार उन्होंने (सुनील शास्त्री ने) अपने पिता की कार चला ली, तो शास्त्रीजी ने किलोमीटर का हिसाब कर पैसा सरकारी खाते में जमा कराया. उनका पूरा जीवन ऐसे प्रेरक प्रसंगों से भरा रहा है उनकी ईमानदारी, उनकी शुचिता के कई प्रसंग मिलते हैं।

 

वह जब देश के प्रधानमंत्री बने, तो उनके पास खुद का कोई घर नहीं था और ना ही खुद की एक कार. एक प्रसंग है- शास्त्रीजी ने जब कार खरीदने के लिए सोचा, तो उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं थे. खाते में सिर्फ 7 हजार रुपए थे, जबकि कार की कीमत 12000 रुपए थी. ऐसे में उन्होंने बैंक से 5 हजार रुपए का लोन लिया. पर, लोन लेने के एक साल बाद ही उनका निधन हो गया। इंदिराजी ने उनके लोन को माफ करने की पेशकश की.  पर, शास्त्रीजी की पत्नी ललिताजी ने उनकी बात को सहजता से नकारते हुए कहा कि किस्तें वह ही भरेंगी। शास्त्रीजी के निधन के चार साल बाद तक ललिताजी ने कार की ईएमआई भरी. लोन चुकता किया शास्त्रीजी की वह कार आज भी दिल्ली के लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल में रखी हुई है। 


आज सोचता हूं तो लगता है कि आखिर किस मिट्टी के बने थे, कैसा उद्दात्त चरित्र था कैसे लोग थे। सत्ता के अहम पद पर रहते हुए भी जीवन अत्यंत सादगी, विनम्रता और मूल्यों के साथ जीना!


शास्त्रीजी जैसे लोग उसी संस्कृति को बढ़ानेवाले, विलक्षण लोगों में से हुए, उन्होंने रास्ता चुना, बिल्कुल ऋषियों की तरह, संघर्ष का, निर्माण का देश में लोकतांत्रिक मूल्यों को व्यवस्थित करने, संविधान को प्रतिष्ठित करने और क्रियान्वित करने का. आदर्श मूल्यों को स्थापित करने का.!


आज क्षेत्रीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर जो लोग लोहिया की बात करते रहे, उन्होंने खुले रूप से अपने परिवार को प्रश्रय दिया. जिन्होंने लोहिया की बात नहीं की, जो नयी चेतना की राजनीति करने दक्षिण में आयें, उनलोगों के परिवार के डेढ़-दो सौ की संख्या में रिश्तेदार राजनीति में छा गए।


शास्त्रीजी, जैसे राजनेता मूल्यों की राजनीति, चरित्र की राजनीति और भारत की जो श्रेष्ठ परंपरायें रही हैं उनके पुंज हैं। ये ऐसे लोग हैं जिन्होंने न परिवार को बढ़ावा दिया, न कभी धन- संपत्ति एकत्र की ये दोनों मानक हैं। तो कम से कम आज के दिन राजनीति करनेवाले हर आदमी को चाहें वह किसी दल का हो, किसी विचारधारा का हो, इनसे ऊर्जा-प्रेरणा लेनी चाहिए.!

Saturday, August 20, 2022

उत्तर प्रदेश भाजपा के संकटमोचन!

 2014 से 2022 तक उत्तर प्रदेश बीजेपी के संकटमोचन श्री Sunil Bansal जी..!


उत्तर प्रदेश के कुशल नेतृत्व संगठनात्मक कार्यशैली के अद्भुत व्यक्तित्व, सरल, कर्मठ,विन्रम,मृदुभाषी संगठन महामंत्री रहे बंसल जी को भारतीय जनता पार्टी ने अब राष्ट्रीय महामंत्री बनाया है। इसके साथ ही उन्हें तीन अहम राज्य पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और उड़ीसा का प्रभारी भी नियुक्त किया है। लोकसभा चुनाव से पहले ये बदलाव बीजेपी के लिए अहम माना जा रहा हैं साथ ही यह सुनील बंसल के लिए बड़ी जिम्मेदारी है और उनका कद भी बीजेपी में बढ़ा है। 


बंसल जी के बारे में कहा जाता है कि पार्टी में और संगठन में बहुत ही मजबूती से कार्य करते हैं। एक वाक्या है कि जब 2022 के उत्तर प्रदेश के चुनाव से ठीक पहले जो बीजेपी के मंत्री रहें स्वामी प्रसाद मौर्य और दारा सिंह चौहान जब बीजेपी छोड़कर समाजवादी पार्टी में चले गए तो बस ये यही दो लोग गए न कि कोई जिला इकाई का एक भी सदस्य। मंडल से लेकर जिला तक एक भी कार्यकर्ता नहीं गया, इस बात से आप साफ अंदाज़ लगा सकते हैं बंसल जी का संगठनात्मक कार्य कुशलता कितना अद्भुत और निपुण है। जब ये 2014 में उत्तर प्रदेश के बीजेपी के संगठन महामंत्री बने थे तो उससे पहले पार्टी में टूट थी, गुटबाजी थी , टिकट के लिए मारामारी थी, अपने ही पार्टी के नेताओं के पुतले उनके ही कार्यकर्ताओं द्वारा हमेशा फूंके जाते थे लेकिन इनके आने के बाद यह सब बिल्कुल बंद हो गया। इन्होंने सभी कार्यकर्ताओं को एकजुट किया सभी का आदर किया, सभी को कामों में झोंक दिया, सभी के साथ सौम्यता दिखाई, सभी को उसका हक दिलवाया और उत्तर प्रदेश के असंख्य कार्यकर्ताओं को जो इज्ज़त सम्मान दिलवाने में अपनी जी जान लगाया है उसे प्रदेश के कार्यकर्ता उन्हें पूरी ज़िंदगी याद रखेंगे। संगठन महामंत्री रहते हुए उत्तर प्रदेश में भाजपा की 2 बार सरकार बनवाने में बंसल जी की बहुत ही अहम भूमिका मानी जाती है। 


बंसल जी को जिन तीन राज्यों को प्रभारी बनाया गया है वे राज्य बीजेपी के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव के लिहाज से काफी अहम साबित होने वाला हैं। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद से बीजेपी ने कई झटके झेले हैं। वहां पार्टी के भीतर सबकुछ ठीक करने की कई कोशिश हुई लेकिन सफलता नहीं मिली। हालांकि पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में 42 में से 18 सीटें जीती थी।


अब बीजेपी के सामने पिछले बार के प्रदर्शन को बरकरार रखना या उससे बेहतर परफॉर्म करने की चुनौती है। उड़ीसा में बीजेपी को पिछले लोकसभा चुनाव में 21 में से 8 सीटें मिली थी बीजेपी यहां विकल्प बनने की कोशिश में हैं साथ ही सीटों की संख्या बढ़ाने की कोशिश में भी। तेलंगाना बीजेपी के मिशन साउथ के लिए काफी अहम है। बीजेपी दक्षिण भारत में अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर रही है और बीजेपी को तेलंगाना से काफी उम्मीदें हैं और यहां पार्टी सबसे ज्यादा फोकस कर रही है। अगले साल तेलंगाना में विधानसभा चुनाव हैं। यहां लोकसभा की 17 सीटे हैं जिनमें से बीजेपी ने 2019 में चार सीटें ही जीती थी। अब आने वाले समय में यह देखना है कि बंसल जी कैसे इन सभी जगहों पर उत्तर प्रदेश जैसा अपना लोहा मनवाते है। 


#sunilbansal #BJP #2024Election #BJPGeneralSecretary #UttarPradesh #BJP4IND

Wednesday, June 22, 2022

Respect Women.!

 That’s powerful...!


Every woman has a past. Some were physically abused. Some had violent parents. Some had pubertal issues. Some had sexual abuse as a child from their own family members. Some had messed up love stories. Some had been forced into sex in the name of love. Some had been drugged. Some were date raped. Some had been viciously photographed on bed. Some had been blackmailed by their ex-boyfriend. Some were in an abusive relationship. Some had menstrual problems. Some had a broken family. Some had a divorce. Some had an obesity issue. Some had financial droughts. Some had drug or alcohol addiction. Some had a few unsuccessful suicide attempts.


If you see a woman, who went through any of these but had already wiped her tears,tied her hair up, masked her sorrows with a divine smile, stood tall and strong, started walking towards her future because she still has some hope left inside her and has not given up on the concept of love that still exists in this world, do not stab her with her past. Do not confront her. Do not slap her with more abuse. Give way for her and walk beside her. May be hold her hands and walk for a while. You'll know how sweet that soul is and how strong her hopes are! You'll be amazed at how she carries herself after all her energy has been sucked out.


She need not always be only the woman next door or from a different home. She could be your own friend, your own sister, your own girlfriend, your own wife, even may be your own mother. 

Do not judge her by her past. Gift her the peaceful future that she deserves. Hold her hands against the world, which knows only to judge. Give her the love that she always yearned for. 

Saturday, May 28, 2022

भ्रष्टाचार के जड़ अधिकारीगण

 बेशक़ आप अपने जनप्रतिनिधियों से सवाल कीजिए,हर मुद्दे पर लड़िए,इसमें कोई शक नहीं है कि ये भी हर चीज़ के भ्रष्टाचार में लिप्त होते हैं...! 


लेकिन जब आम जनता सरकारी महकमों में बैठे कर्मचारियों से लेकर बड़े-बड़े अधिकारियों के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करने लगेंगे तो यकीन मानिए की हर चीजें बदलनी शुरू हो जायेगी...! क्योंकि सारे योजनाओं में अपनी कमीशन को बांट कर खाना योजना को सफल नहीं बनाना साफ साफ बात है की सारे भ्रष्टाचार के जड़ यही सब अधिकारी लोग होते हैं...!